अक्स

कुछ कहूं अपनी,
कुछ सुनूं आपकी,
यही सोच कर मैं यहाँ पर हूँ .
पर! क्या कहूं, क्या सुनूं,
कुछ नया नहीं है .
सबकी एक ही दासता,
जो मैंने महसूस की, 
वही सबने की है ,
कुछ शब्द बदल जाते हैं,
बात वही रह जाती है .
मैंने भी सोचा, किसी चहरे को,
नजदीक से पढ़ा जाए,
कुछ दिल की बात की जाए ,
वह चेहरा जो दूर से,
काफी अच्छा लग रह था.
नजदीक गया तो,
मेरे जैसा ही था.
थोड़ी रोशनी हुई तो ,
पता चला , 
मेरा ही अक्स था.  

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