माँ पुरानी है

उसने हर किसी से , 
अपने बेटे को पूँछा ,
 कोई तो उसे जानता होगा ,
वह इतना बड़ा आदमी है , 
बड़े मकान में रहता है,
बेटे का रंग-रूप,
घर के पास कि निशानियाँ भी बताई,
जिसमे एक पुराना पेड़, छोटी दुकान थी . 
वह जिन चीज़ों को जानती थी, 
सबका जिक्र किया , कुछ पता नहीं चला ,
क्योंकि ऐसा तो हर शहर में होता है ,
कोई किसी को नहीं जानता।
वह पढ़ना-लिखना नहीं जानती , 
दुनिया कि चालाकी नहीं समझती .
बेटे के प्यार में शहर आई थी,
लाडले ने खूब फुसलाया था,
गाँव में जो भी बचा था,
उसे बेचना था।
जल्द ही बोझ बन गयी,
बुढ़ापे का भार उठाना मुश्किल हो गया,
बेटे को पढ़ाने लिखाने में क्या-क्या सहा था,
कितने दिन भूखे रहकर, उसे खिलाया था।
आज मुन्ना बड़ा आदमी बन गया,
वह सब कुछ देखता है,
बस माँ नज़र नहीं आती।
शायद! कमज़ोर बूढी "माँ"
अच्छी नहीं लगती, 
ऊंची सोसाइटी के  फैशन में नहीं जँचती।
आखिर उसकी भी तो कोई इज्ज़त है,
लोग क्या कहेंगे?
अरे! यही साहब की माँ है?
बेटे को इज्ज़त प्यारी है,
उसे माँ की ज़रुरत ही कहाँ है?
वह तो सबसे बेकार,
पड़े फर्नीचर से भी पुरानी है,
बेटे ने एक अच्छी तरकीब निकाली,
माँ को थोडा सा फुसलाया,
कहीं घूमने के लिए मनाया,
थोड़ी देर में आ रहा हूँ ,
ऐसा कह कर बैठाया,
लेकिन यह शहर दूसरा था।
वह अब भी बेटे के इंतज़ार में बैठी है, 
थोडा आस पास रोज़ भटक लेती है,
पर! दूर नहीं जाती, 
बेटे को परेशानी न हो,
यह सोचकर, 
वापस वहीं आ जाती है।
जहाँ बेटे ने बैठाया था, 
वहीं बैठ जाती है।
जिस तरफ गया था, 
अपलक उसी को निहारती है,
उसका बेटा आएगा,
इसी .......
उम्मीद में बैठी है ..     

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