दो दूनी ?


दो का चार तो हो जाता,
पर किसी का हक,
मारा जाता है . 
चोरी करना क़ाबलियत बन गयी ,
मज़हब दलालों का अखाडा बन गया, 
पैसे का ही सब तमाशा हो गया. 
उसे कैसे भी पाना इमान है ,
बेइमानी भी आज भगवान है ,
यह नया दौर आया है, 
व्यापारियों को खूब भाया है .
"डर" का कारोबार बढाया है, 
इंसानों को बेचकर, खूब माल कमाया है,
ऐसे में ,
रोज़ जीने वालों का क्या होगा ? 
जब घर से निकलना ही मुश्किल होगा !
जानें कहाँ कब धमाका हो जाए,
इंतजार में बच्चे ,बिना खाए सो जाएँ .
कोई पिता सड़क पर बिखरा होगा, 
घर में खाने को कुछ नहीं होगा ,
मातम भी कैसे मनाएगे,
जो बिखरा है, 
उसका पता कौन बताएगा ?
फिर दो का चार करने में ,
कितनों का हक मारा जाएगा ,
एक दिन खुद बिखर जाएँगे तो ,
कोई नहीं उठाएगा.       

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