गिरगिट

एक ही ड़ाल पर बैठे,
 कई दिन बीत गए थे.
 सोचा ! इस आलस को छोड़ा जाए,
कुछ नए फूल और पत्तों को परखा जाए ,
कुछ नहीं तो, 
एक डाल से ,दूसरी पर ही जाया जाए.
 अपना रंग भी बदला जाए,
काफी दिन हो गए,
एक डाल ही पर, एक पत्ते के साथ रहते .
उनमे ही खो गया था ,उन जैसा हो गया था ,
इस आलस ने रंग कुछ ,पक्का कर दिया. 
लगता है, एक रिश्ता बन गया .
पर रंग तो बदलना होगा ,
जिन्दा रहने को, 
नए डाल, नए पत्तों पर जाना होगा .
उन्ही के रंग में रंगना होगा .
यहाँ तो रोज़ पुराने पत्ते गिरते हैं ,
नए लगते हैं. 
उसे भी रोज़ बदलना होगा ,
जो उसकी पहचान है ,
सबकी रंग में रंग जाना ,
हर फूल-पत्ती में मिल जाना ,
उनके जैसा हो जाना .
जिससे वह खुद को ढूंढ न पाए,
कोई उसे देख न पाए .
वैसे भी, 
गिरगिट का तो स्वभाव ही है, 
रंग बदलना....... 

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