sunrise


रात की चादर ओढ़ के ,
जब दुनिया सो जाती है .
 कुछ आँखे अलसाई सी ,
किसी की याद में खोई सी .
तन्हाइयों में रोई सी ,
तलाश में अपनों के निकल पड़ती हैं ,
दूर अँधेरे में ,दीवारों से टकराती हैं .
थक कर कमरे की दीवारों तक जाती हैं ,
 कदम वहीँ रुक जाते हैं ,
सपनों को, खिडकियों में ढूँढता है ,
 बंद दरवाजे को बार -बार देखता है .
शायद कोई दस्तक ,बिछड़े यादों से मिला दे .
आसमान भी कितना छोटा है उसका ,
अँधेरे में काला ही नज़र आता है ,
कोई चाँद सितारें नहीं इसमें .
सूरज भी ,लगता है, 
किसी कोने में चादर ओढ़के सो गया .
वह तन्हाइयों से बातें करता है ,
उदास ,कमरे को देखता है .
पता नहीं कब, आँख लग जाती है .
लगता है, सबेरा होने वाला है ,
खिड़की से, सुनहरी धूप झाँक रही है ,
सूरज ने दरवाजा खटखटाया है ,
साथ चलने को बुलाया है . 

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