सब ठीक है !

वैसे ही सब कुछ अगाध, अविरल गति से चलता रहा .
बिना रुके , एक पल  लगा था .
सब कुछ ठहर गया है .
पर ! ऐसा कुछ नहीं, सब तब जैसा ही सामान्य है,
भावना शून्य ,मूक . सभी कदम अब भी चल रहें है,
आँखें हाथ सब हिल रहे हैं,
हाँ ए सब अब भी जिन्दा है .
आज फिर कोई अमानवीयता के भेंट चढ़ गया,
पर कुछ खाश नहीं हुआ !
कुछ पल, कुछ दिन, कुछ लोग मुरझाए रहे .
आखिर सब्र टूट ही गया ,
फिर सब उसी तरह चलने लगा,
किसी के साथ कुछ भी हो, क्या फर्क पड़ता है,
सब सामान्य ही  दिखता है, एक  आदत हो गयी है .
चुप रहना , कुछ न कहना ,सब का जड़ हो जाना ,
आज हम भी, जिन्दा लाशों के बीच जिन्दा हैं ,
खुद को अपने कंधे पर ढोते हैं ,
सिर्फ अपने ही बोझ से दब जाते हैं ,
सब सामान्य रहे,
इसलिए खुद को भूल जाते हैं .
भीड़ में शामिल होते ही,
सब ठीक हो जाता है .

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