बंधन

क्या कहीं कोई आज़ाद है ?
सब कुछ एक नियम से, 
एक व्यवस्था में बंधा है .
जन्म लेते ही ,बंधन में बंधना है .
पहले माँ का प्यार ,पिता का दुलार .
थोडा वक्त गुजरा ,
रिश्तों की डोर बड़ी हो जाती है .
चारों तरफ से जकड लेती है ,
हर इच्छा ,हर जरूरत, एक बंधन है .
इसमें बंधना ही नियति है  ,
 इसी से रिश्ते- नाते, 
देश -समाज बनता है .
पहली सांस से,
 आखरी सांस तक, सब बंधा है ,
कोई आज़ाद कहाँ है ?

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