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जीवन

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जीवन की परिभाषा , क्या दे सकती है कोई भाषा । आशा और निराशा के बीच , निरंतर चलते जाना । जैसे जीवन जीना , जीवन और मृत्यु के बीच । कुछ पा लेने की ख्वाइश , या फिर छूट जाने का डर । निरंतर दुविधा और संशय के साथ , अहर्निश चलते जाना,
नए शब्द और भाषा के साथ । यह सच है या वह झूठ, 
सब कुछ जान लाने का भ्रम । वह जीवन जीता निरंतर , सच और झूठ का ना कोई अंतर । वह सही है वह जानता है , क्या अर्थ है जीवन का । गढ़ लेता है नित नए, 
शब्द और भाषा । पर कभी पुष्ट नहीं हो पाती, 
उसकी परिभाषा । दुःख, प्रेम, ईर्ष्या, 
तक ही सीमित, हो जाती है उसकी भाषा । कौन अपना, कौन पराया, जीवन भर यही सीख पाया । खूब रोया, खूब चिल्लाया, पर ! जीवन को न समझ पाया । क्योंकि वह कभी, 
निःशब्द, 
नहीं हो पाया , अर्थात मौन न हो पाया , शब्द और भाषा से ही, 
परिभाषा रचता रहा । अगर कभी बाहर से,
 मौन हुआ भी तो, अन्दर सब चलता रहा ।।