नियम


बेगाने बन जायेंगे अपने,
अपनों से मिलाना कम होगा ।
याद तो आएगी अक्सर,
आँखों में आंसू भी आयेंगे ।
पर ! नियम है ऐसा ही,

बच्चे उड़ जाते पंख जमते ही ।
सूनी आँखे रह जाती, 

उसके वापस न आने पर ।
उसकी मंजिल, उसकी राह,

चल दिया छोड़ घर बार ।
बेटी तो चल देती ससुराल, 

बेटा भी कहाँ रहता साथ ।
खाने कमाने के चक्कर में,

वह भी जाता है परदेश ।
माँ रह जाती घर पर तन्हा, 

बेटी - बेटों की यादों में ।
कैसे डाटा था मुन्ने को, 

कैसे प्यार किया था ।
बेगानों के बीच गया वो, 

कैसे लड़ता होगा उनसे ।
जो रोते - रोते आँचल में, 

छुप जाता था मेरे ।
पापा की जब भी पड़ती, 

थोड़ी सी डाट उसे ।
बेटी भी कैसे होगी ससुराल में ,
पापा की बेटू थी जो,
लाडली पोती थी वो ।
भाइयों से दिन रात  लड़ती,

बात-बात पर रोती थी वो ।
कैसे नियम में बांध पाएगी? 

कैसे उठाना है ? कैसे बैठना है ?
धीरे से बात करना है,

अब उसे अच्छी बहू बनाना है ।
इस नियम को बनाया हमने,

इस नियम को माना मैंने ।
बेटी - बेटों ने ही माँ कहा मुझको, 

पूर्ण किया मुझको ।
वह वक्त भी आ गया,

जब बच्चे दूर उड़ने लग गए ।
अब मुझे छोड़ , एक नया घर बनाएँगे ।
मुझसे मिलने कभी -कभी आएँगे ।
तब मैं भी अपना पुराना घर, 
छोड़ चली जाउंगी ।
एक दिन जब,
मेरे बच्चे,
मम्मी-पापा बन जाएँगे,
नई शक्ल लेकर मै,
फिर इस घर में आऊँगी 
 तब अपने मम्मी -पापा  ,
का चस्मा लेकर 

बिस्तर के नीचे छिप जाउंगी ।

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