Thursday, 13 July 2017

एक माँ एक बेटा

यह एक प्यारे से बच्चे की कहानी है
शायद उसे डाट कम पड़ी
या प्यार बहुत मिला
जिसकी वजह से उसमें
एक ऐब आ गया।
वह पानी किसी और चीज को
समझने लग गया।
माँ जिसे वह बुढ़िया कहता है
वह भी बेटे पर हद से
ज्यादा यकीन करती है।
बेटे को भी अपना रोग मालूम है,
ऐसे में वह भी न जाने खुद को
कहाँ-कहाँ ढूँढता रहता है।
जब फुर्सत से किसी आइने में
खुद को देखता है
तो हर बार उसका अक्श
यही जवाब देता है- 
तूँ पूरा है इसका यकीन कर,
खुद की तलाश में,
कुछ और हो जाना,
क्या ठीक है?
कौन किसको पी रहा,
ए कहाँ पता चलता है?
सच कहूँ तेरा हारना
एक जाम से
अच्छा नहीं लगता।
तेरे पास तो वो
चाँद वाली बुढ़िया भी है,
जो अब भी तेरे पास रहती है
तुझमे भी तो जिंदगी का
भरपूर नशा है,
फिर तुझे
इन मामुली चीजों की जरूरत
क्यों पड़ती है?
अच्छा है!
तुझे मालूम है
तूँ जिंदा है
जानते हो क्यों?
किसी की उम्मीद हो,
नाज  हो तुम,
अरे! लगता है ..
अपनी बुढ़िया के
आसपास
हो तुम।
बस उसकी सूरत देखकर
खुद से पूँछो
कौन किसको देखकर
जिंदा है अब?
क्या कहूँ देखकर इनको,
अब भी यही लगता है
सबसे मुश्किल काम है,
माँ-बाप होना।
rajhansraju

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