Wednesday, 31 May 2017

बेमकसद

जब वह
कहीं खामोशी से बैठे होता हैं,
उनको लगता है
वो बेमकसद और बेकार हैं,
तब काम आती है
हुनर आवारगी की,
वह निकल पड़ता है
अनजानी राहों पर,
भटकता रहता है,
उसे भी पता नहीं होता,
वह रोज क्या ढूँढता रहता है?
इन रास्तों से लौटना नहीं चाहता,
पर क्या करे थक जाता है,
क्यों कि कुछ मिलता नहीं है,
फिर वही पछतावा क्यों निकला घर से।
जब सब कुछ पास में होता है,
वह नजर नहीं आता है,
जिस चीज को आदमी बाहर ढूँढता है,
वह अंदर बेकार पड़ी है,
थोड़ा सुकून से बैठो,
इतनी जल्दी भी क्या है?
गौर से देखो
इस वक्त पास में क्या है?
तूँ है!
तूँ जिंदा है!
ए एहसास
बहुत है।
rajhansraju

Saturday, 27 May 2017

कौन किसको पी गया?

मैंने देखा है,
दोस्त को फ़ना होते,
उसको जाते,
घर वालों को विदा करते,
कौन किसको पी गया,
किससे क्या कहूँ?
आज भी,
उसके जैसा,
जब किसी को देखता हूँ,
बेब़स, उदास हो जाता हूँ,
उसको याद करके।
मेरे सामने होता है,
वो चेहरा आज भी,
हाँ! नाराज था,
पर ए नहीं सोचा था,
इसके बाद,
अब मिलना नहीं होगा कभी।
उसके जाने का वक्त था,
हमारी नजरें मिली,
एक दूसरे से,
कुछ छुपाया हमने,
आँसू थे,
आँख में हमारे,
अब नस़ीहत नहीं थी कोई,
बस यही कहना था,
यूँ  मत जाओ,
सबको छोड़कर।
वह मुस्करया,
जैसे कहना चाहता हो,
कहीं नहीं जाऊँगा,
किसी को छोड़कर।
हाथ थामे बैठे रहे बहुत देर तक,
जो बहुत बोलता था,
आज कुछ कह न सका,
खामोश ऐसे हुआ,
जैसे कुछ जानता नहीं,
कंधे पर बैठकर हमारे,
न जाने क्यों रुखसत हुआ?
अब भी यही सोचता हूँ,
किससे क्या कहूँ?
कौन किसको पी गया?
अब तक समझ पाया नहीं ..
rajhansraju

Thursday, 18 May 2017

मेरा शहर

कितना मुश्किल है
खुद को बचाए रखना,
खासतौर पर उन परिंदे को
जिनमें थोड़ी गोश्त होती है,
हमारे शहर भी कुछ ऐसे ही हैं,
जो अब भी इंसान की तरह जीते हैं,
तभी तो उनके  नाम बदल जाते हैं,
और उसका कत्ल भी होता है,
उसका लहू बहता है, मातम पसर जाता है,
उसके श्मशान बन जाने का शोर भी होता है,
सुना है आज वो मर गया,
जिसके जश्न की खबर भी छपी है,
वह किसी गैर मजहब या बिरादरी का शहर था,
उसमें अब भी कुछ गोश्त बाकी है,
शायद इस वजह से,
धमाके कुछ रुक-रुक के हो रहे हैं,
दूसरे शहर के लिए नारे लग रहे हैं,
अब यहाँ पूरी खामोशी है,
कहते हैं अमन कायम हो गया,
पर वो शहर अब नहीं रहा,
कुछ भी सही सलामत नहीं है,
जो जिस्म जिंदा हैं,
वो पूरी तरह खाली है,
उनके सामने पूरा शहर मर गया,
और न जाने कितनों का वजूद भी खत्म हो गया,
शहर कभी तन्हा नहीं होता,
वह अपने हर शख्स के साथ रहता है,
तभी तो जब कोई किसी दूसरे शहर जाता है,
उसकी पहचान में उसके शहर का नाम आता है,
अब हम हर उस शहर के लिए दुआ करते हैं,
जो पूरा जिस्म है
जिसकी सांसे चल रही है,
उससे मिलना तो बस यही कहना,
तेरे चाहने वालों की अब भी कमी नहीं है,
उनके सपनों के लिए,
तेरी अब भी उतनी ही जरूरत है,
इसी उम्मीद के लिए
खुद को बचाए रखना,
जब हम मीलों सफर कर चुके हों,
फिर कभी यूँ ही मिले,
और मै हँस पडूँ,
कि हाँ!
ए मेरा शहर है।
rajhansraju

Monday, 15 May 2017

Delhi=Bangaluru

शर्म के सिवा सब है
फक्र करने की वजह
क्या अब भी बची है?
अब किसी के मजहब का
जिक्र मत करना
बेहयायी में
सब एक जैसे हैं
कफन ओढ ली है
जमीर मरे
एक अर्षा हो गया।
फिर वजह का जिक्र होगा
कोई सियासत, कोई मजहब का,
अजीब सा वजूद गढ़ रहा होगा।
ए सही है यही होगा
ठेकेदार चिल्ला रहा होगा
फिर जो सबसे कमजोर होगा
सारा इल्जाम उसी पर लगेगा
बहुत होगा
कुछ देर शोर मचेगा
जल्द ही
बोर हो जाएंगे
सब भूल जाएंगे
उसी मरे ज़मीर में
लौट जाएंगे।
Rajhansraju

तूँ कैसा है?

रंग तेरा आसमनी है
हमको लगता है
दिन-रात के साथ तूँ बदलता है
चटख लाल, काला भी दिखता है
बेरंग रहकर रंगों को रचता है।
चलो हम भी एक काम करते हैं
उसकी बनायी दुनिया में
खूबसूरत रंग भरते हैं
थोड़ा नाराज होकर साथ चलते हैं
अच्छा होता है बेवजह मुस्करा लेना
रंग से सरोबार होकर
चेहरों को भुला देना
किसकी शक्ल कैसी है
परेशाँ क्यों है?
वैसे भी तूँ
न तो पानी है
न आइना है।
थोड़ा सा रंग हाथों में लेकर
सबसे पहले अपना चेहरा भुला दे
फिर धुलकर देखना क्या मिलता है
पहले जैसा कुछ बचता है?
या वही बेरंग चेहरा है
जिस पर कोई रंग चढ़ता नहीं है
rajhansraju

Saturday, 13 May 2017

मै हूँ

सच सिर्फ इतना है
मेरे नाकाम होने का
मै जैसा हूँ,
हर बार वैसा ही होता हूँ,
मेरा रंग,
नहीं बदलता गिरगिट की तरह
छुप नहीं पाता हूँ
औरों की तरह
क्या करूँ मै
सिर्फ दिखता ही नहीं हूँ
अब तलक इंसान हूँ
rajhansraju

सब एक जैसे हैं

सोचता हूँ
रहने दूँ दफ्न उनको
या पड़ा रहूँ अपनी कब्र में
मगर क्या करूँ?
एक एहसास कायम है
यह भी लगता है
अभी तक जिंदा हूँ
और उसकी भी साँस
चल रही है
rajhansraju

पिंजडा

आजाद बंदों को अपनी,
एक दुनिया चाहिए
परिंदे को, पिंजडा छोड़कर,
उड़ जाना चाहिए।
पर! भूल गया है उड़ना
अब बेचारा क्या करे?
रोशनी इतनी है कि आँख खुलती नहीं
शोर चारों तरफ है, कुछ सुनाई देता नहीं
भीड़ में अकेला हैं, कोई दिखाई देता नहीं
फिर शिकायत भला किससे करे
ए रास्ता,
उसने खुद चुना है
सुनहरे
पिंजडे
के लिए ।।
rajhansraju

हाँ मै भी हूँ

वो अकेली
यूँ  ही चली जा रही थी
हर नजर उसकी तरफ बढ़ रही थी
आँख सबके हाथ है
वो जिस्म के सिवा कुछ नहीं थी
हलाँकि उस औरत से
सभी का एक रिश्ता था
शायद! घर पे जिन्हें वो छोड़ आया था
तभी उसे याद आया
बिटिया के साथ बाजार जाना था
उसके पीछे अब भी उसी के चर्चे हैं
ए जंगल बडा अजीब  है
कहने को यहाँ
सिर्फ इंसान रहते हैं
भीड़ तो बहुत है
पर
आज भी आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
rajhansraju