Sunday, 10 July 2016

हार-जीत

उनका क्या दोष है, जो सिर्फ माँ-बाप है,
हर बार उनके हारने की, रश्म चल पडी है
पिछली बार भी जो जनाज़ा निकला था,
वह उन्ही के बेटे का था, और इस बार भी,
न जाने यह दौर, कितना और लम्बा चलेगा,
फिर मरने वाले का, कोई मज़हब तो रहेगा ही,
लोग ऐसे ही उसका तमाषा बना देंगे,
अगली लाश कहीं किसी और की होगी,
कोई फौज़ी होगा, कोई काफिर होगा,
कैसा भी होगा, इसी मिट्टी का बना होगा,
वही गम होगा, वही आँसू होंगें,
वैसा ही घर सूना होगा,
फिर कौन?
किसका इंतज़ार करेगा,
इन हारे माँ-बाप को,
भला कौन?
याद रखेगा..

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