Saturday, 25 June 2016

तन्हा पहाड़

आज़ पहाड़ को देखा,
तन्हा उदास था,
मैने पूँछा “क्या हुआ?”
उसने बेदरख्त सूखे चेहरे पर,
थोडी मुस्कराहट लाने की,
 नाकाम कोशिश की,
उसकी बदरंग झुर्रियाँ,
हरे पेडों को,
न जाने कहाँ छोड़ आयी थी,
वो मासूम पौधे जिनमें लगे फूल,
उसमें रंग भरते थे,
वो भी तो नहीं दिखते
दूर से टेढी-मेढी लकीरों जैसी,
दिखने वाली नदी, 
जो हर वक़्त गुनगुनाती,
और पहाड़ किसी बूढे‌ बाप की तरह,
खिलखिला उठता,
अब खामोश है,
वहाँ से कोई आवाज़ नहीं आती,
उसका बस मेरी तरफ यूँ देखते रहना?
मुझे सवालों के घेरे में लाता रहा,
मै उसे कहाँ कोई जवाब दे पाया?

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