Saturday, 25 June 2016

तन्हा पहाड़

आज़ पहाड़ को देखा,
तन्हा उदास था,
मैने पूँछा “क्या हुआ?”
उसने बेदरख्त सूखे चेहरे पर,
थोडी मुस्कराहट लाने की,
 नाकाम कोशिश की,
उसकी बदरंग झुर्रियाँ,
हरे पेडों को,
न जाने कहाँ छोड़ आयी थी,
वो मासूम पौधे जिनमें लगे फूल,
उसमें रंग भरते थे,
वो भी तो नहीं दिखते
दूर से टेढी-मेढी लकीरों जैसी,
दिखने वाली नदी, 
जो हर वक़्त गुनगुनाती,
और पहाड़ किसी बूढे‌ बाप की तरह,
खिलखिला उठता,
अब खामोश है,
वहाँ से कोई आवाज़ नहीं आती,
उसका बस मेरी तरफ यूँ देखते रहना?
मुझे सवालों के घेरे में लाता रहा,
मै उसे कहाँ कोई जवाब दे पाया?

Saturday, 4 June 2016

चूहों की लडाई

आओ मिलके कहें कहानी, 
नहीं करेंगे हम शैतानी,
देखो चूहा घर में आया, 
हमसे कहने है कुछ आया,
अब बिल्ली की नहीं चलेगी, 
सब चूहों ने है ठानी,
दूध मलायी खाना है, 
बिल्ली को भगाना है,
कोई चूहा नहीं ड‌रेगा, 
अपना सब पर राज़ चलेगा,
चूहा अकड‌ के आया अंदर, 
जैसे हो वही सिकंदर,
अब अपना नारा होगा, 
कोई चूहा राजा होगा,
उसके पीछे दो तगडे‌ चूहे, 
आगे पीछे चूहे-चूहे,     
लडने कि तैयारी शुरू हुई, 
सेना आके खडी हुई,
तभी एक बूढा‌ चूहा आया, 
ज़ोर-ज़ोर वह चिल्लाया,
बिल्ली आयी..बिल्ली आयी,
दुम दबके भगे सारे
बूढा चूहा बोला हँसके,
बिल्ली से क्या खाक लडेंगे,
     ए तो हैं पक्के चूहे..