Wednesday, 11 May 2016

नीली नदी

वह नीली नदी अब नहीं मिलती,
उसे बेपानी हुए अर्सा हो गया,
उसकी चाहत में दबे पाँव,
रात में निकल पडता हूँ,
अंधेरा और पानी दोनों,
एक जैसे ही दिखते हैं,
जैसे नदी खामोशी ओढे‌,
चुप-चाप बैठी हो,
मै उसका किनारा थामे,
वहीं उसके पास,
ठहर जाता हूँ..

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