Saturday, 9 January 2016

समझ

काश मुझमे थोडी समझ होती,
रामयन,कुरान समझ पाता,
तो सोचिए दुनिया कैसी होती।
अफसोस यही है कि सब सही हैं,
सब अपनी पर कब से अडे हैं,
शायद इसी वज़ह से,
अब तक वहीं गडे हैं,
न आगे बढे‌, न कुछ सीखा।
काश पेड़ ही होते, 
तो,वक़्त के साथ बढ जाते,
फल नहीं तो, कम से कम छाया देते,
या फिर सूख जाते, मुर्झा जाते,
लकडी बनते,
किसी चूल्हे  में काम आते। 

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