Tuesday, 8 November 2016

पता?


वक्त ही जाने कहाँ, कैसे, कब, क्या हो जाता है,
ए भी हुआ कि अब उन्हें, यहाँ का पता याद नहीं,
विदा हो चुकी बेटी ने,
जब पिता से उसका पता पूँछा,
उसे किसी कार्यक्रम की पाती भेजनी थी,
सवाल तो सही था पर क्या जवाब देता,
जहाँ जन्म लिया वो उसका नहीं था,
फिर वह कैसे याद रखती,
उन बेगानी चीजों को,
पिता ने खुद को समझाया,
अब बिटिया सयानी हो गयी,
अपने घर में रच बस गयी है,
अपनी जिम्मेदारियाँ समझने लगी,
तभी तो यहाँ का पता...
भूल गयी...

Friday, 4 November 2016

अभिव्यक्ति


जब देश रहेगा, लोग रहेंगे, लोकतंत्र तभी रहेगा,
न जाने कितनी, सरकारों का आना जाना होगा,
जब सवाल उठेगे, उनके जवाब मिलेंगे,
तब राह बनेगी, हम बनेंगे, देश बनेगा,
जो आवाज उठी, वो घुट गयी
तो सोचो, सच कौन कहेगा?
कुछ कड़वी, कुछ बुरी लगी,
पर बात तो उसने सही कही,
मुझको भी अच्छा लगता है,
सुनना कहना अपने मन की,
सच तो सच होता है,
पर कह पाते हैं कितने?
कुछ आवाजें,
जो रखती हैं जिन्दा,
न जाने किस किसको,
कभी उम्मीद बन जाती है वो,
किसी ऐसे कि, जो न था खबरों में,
वह न तो मेरे जैसा दिखता,
न मेरे जैसा कहता है,
पर वह हम में ही रहता है,
अपना ही हिस्सा है,
कुछ उसकी बात भी होनी है,
कुछ ऐसी जगहे रहने दो,
औरों को भी कुछ कहने दो,
असहमत होने का हक तुमको है,
उनको भी अपनी कहने दो..

Thursday, 3 November 2016

रिश्ता


बहुत कुछ,
कहना सुननाा था,
खामोशिया हमारे दरमिया,
वैसे ही कायम रही,
रोज मिलना,
कोई बात न होना,
यूँ ही चलता रहा,
हमारे बीच जरूर,
कोई रिश्ता रहा है,
जो हम अब तलक,
मिलते रहे।।

रोशनी


एक किरण गुजरती है,
जब किसी अंधेरे से,
वह कितना भी घना हो,
मिट ही जाता है।
दिया उम्मीद है,
हजारों हसरतो की,
हम भी रौशन कर ले,
अपने उसी कोने को।

शोर


शोर इतना है कि सच शरमा के,
न जाने कहाँ छुप जाता है,
भरोसा कैसे करे कोई,
जब शक रहनुमाओ पर होता है।
खुद की हौसला अफजाई,
पीठ थपथपाई का गजब दौर है,
सच झूठ का मेल जो दिखता है,
सब मीडिया का खेल है।
कातिल मेरा कौन है?
इसका फैसला अब कैसे करूँ?
जिस पर सबसे ज्यादा ऐतबार था,
खंजर तो उसी के हाथ में है।

नजरिया


फर्क नजरिए का है,
देखना नहीं आता,
वैसे भी हमारे बीच कितने शायर,
कितने मकबूल रहते हैं,
जिसने सीता-राम को अपने,
रग रंग में बसा रखा था,
उसका मजहब अब भी पूँछते हो?
हम ही फैसला करें,
हमने क्या दिया?क्या लिया?
अपनी हुनरमंदी से,
जिसने दिया, उसे जहर दिया,
लोग उस पर हॅसते रहे,
कहाँ समझ पाए अब तक,
तुलसी, कबीर को..

Tuesday, 23 August 2016

हिदुस्तान मेरा है


वो बच्चे जो सड़कों की,
खाक छान रहे हैं,
उनकी जेब में आज, 
कल वाला फटा तिरंगा है,
हाँ यहीं कूडे से मिला है,
जो अब उनकी अमानत है,
कल वाले नारे अब याद नहीं,
पर इन्हीं नन्हे हाथों में,
आने वाला हिन्दुस्तान है..

Sunday, 10 July 2016

हार-जीत

उनका क्या दोष है, जो सिर्फ माँ-बाप है,
हर बार उनके हारने की, रश्म चल पडी है
पिछली बार भी जो जनाज़ा निकला था,
वह उन्ही के बेटे का था, और इस बार भी,
न जाने यह दौर, कितना और लम्बा चलेगा,
फिर मरने वाले का, कोई मज़हब तो रहेगा ही,
लोग ऐसे ही उसका तमाषा बना देंगे,
अगली लाश कहीं किसी और की होगी,
कोई फौज़ी होगा, कोई काफिर होगा,
कैसा भी होगा, इसी मिट्टी का बना होगा,
वही गम होगा, वही आँसू होंगें,
वैसा ही घर सूना होगा,
फिर कौन?
किसका इंतज़ार करेगा,
इन हारे माँ-बाप को,
भला कौन?
याद रखेगा..

Friday, 8 July 2016

रहनुमा

कत्ल किसी और से कराके, 
कातिल बच निकलता है,
हमारा रहनुमा, 
यूँ ही,
बेदाग रह जाता है,
बच्चों के हाथ में,
वह कभी चुपके से,
कभी मज़ाक में, 
कोई हथियार,
थमा जाता है

Saturday, 25 June 2016

तन्हा पहाड़

आज़ पहाड़ को देखा,
तन्हा उदास था,
मैने पूँछा “क्या हुआ?”
उसने बेदरख्त सूखे चेहरे पर,
थोडी मुस्कराहट लाने की,
 नाकाम कोशिश की,
उसकी बदरंग झुर्रियाँ,
हरे पेडों को,
न जाने कहाँ छोड़ आयी थी,
वो मासूम पौधे जिनमें लगे फूल,
उसमें रंग भरते थे,
वो भी तो नहीं दिखते
दूर से टेढी-मेढी लकीरों जैसी,
दिखने वाली नदी, 
जो हर वक़्त गुनगुनाती,
और पहाड़ किसी बूढे‌ बाप की तरह,
खिलखिला उठता,
अब खामोश है,
वहाँ से कोई आवाज़ नहीं आती,
उसका बस मेरी तरफ यूँ देखते रहना?
मुझे सवालों के घेरे में लाता रहा,
मै उसे कहाँ कोई जवाब दे पाया?

Saturday, 4 June 2016

चूहों की लडाई

आओ मिलके कहें कहानी, 
नहीं करेंगे हम शैतानी,
देखो चूहा घर में आया, 
हमसे कहने है कुछ आया,
अब बिल्ली की नहीं चलेगी, 
सब चूहों ने है ठानी,
दूध मलायी खाना है, 
बिल्ली को भगाना है,
कोई चूहा नहीं ड‌रेगा, 
अपना सब पर राज़ चलेगा,
चूहा अकड‌ के आया अंदर, 
जैसे हो वही सिकंदर,
अब अपना नारा होगा, 
कोई चूहा राजा होगा,
उसके पीछे दो तगडे‌ चूहे, 
आगे पीछे चूहे-चूहे,     
लडने कि तैयारी शुरू हुई, 
सेना आके खडी हुई,
तभी एक बूढा‌ चूहा आया, 
ज़ोर-ज़ोर वह चिल्लाया,
बिल्ली आयी..बिल्ली आयी,
दुम दबके भगे सारे
बूढा चूहा बोला हँसके,
बिल्ली से क्या खाक लडेंगे,
     ए तो हैं पक्के चूहे..      

Wednesday, 11 May 2016

नीली नदी

वह नीली नदी अब नहीं मिलती,
उसे बेपानी हुए अर्सा हो गया,
उसकी चाहत में दबे पाँव,
रात में निकल पडता हूँ,
अंधेरा और पानी दोनों,
एक जैसे ही दिखते हैं,
जैसे नदी खामोशी ओढे‌,
चुप-चाप बैठी हो,
मै उसका किनारा थामे,
वहीं उसके पास,
ठहर जाता हूँ..

Sunday, 1 May 2016

मेरी गंगा

Photo From The Wall of Sunil Umar
काफी दिनों बाद सोचा! चलो संगम हो आता हूँ,
अरे यह क्या? तुम कहाँ हो? कहाँ गयी?
अपनी बहन यमुना से मिलकर, कितना खिल जाती थी,
पर आज़ ? 
तुम्हारे साथ ऐसा नहीं हो सकता?
वह तो अरैल किनारे डरी, सहमी, 
एक दम से सिमटी दुबकी,
तुम्हे...ऐसे......देखकर....क्या कहूँ?
ज़ोर-ज़ोर से रोने का मन कर रहा था,
ए हमने क्या किया?
जब तुम्हारा ए हाल है तो बाकी का क्या होगा?
भगीरथ की संतानों...
गंगा को मनालो,
उसको उसका हक़, उसका पानी, उसकी ज़मीन लौटा दो
तुम्हे सिर्फ अपने हिस्से का लेना है,
गंगा का परिवार बहुत बडा‌ है, उसको तो सबके लिए जीना है
जिसमे निर्झर जीवन बहता हो, उसको खुलकार जीने दो,
हाँ! माँ कह देने से मन तो भर जाता है,
पर! अरे! अभागे, निष्ठुर, निर्दय,
कब तक हाथ पसारोगे,  
जब खुद वह भूखी प्यासी हो,
कब तक प्यास बुझाएगी,
अंतहीन लालच तेरी,
उसकी...ज़ान... ,

Sunday, 17 April 2016

जिद्दी बच्चे

जब गाँव, गलियों में,
आइसक्रीम वाले की आवाज़ सुनकर, 
बच्चे झूम उठते, कम से कम एक तो लेनी है,
इसकी ज़िद और लडा‌ई शुरू हो जाती, 
अंत में माँ-बाप हार जाते, 
उस सस्ते मीठे बर्फ के टुकडे से,
बच्चों को खुशियों के पर लग जाते, 
न अब वो ठेले दिखते हैं न वह साइकिल,
जिसका इंतज़ार सुबह होते ही शुरू हो जाता, 
अब तो सब कुछ साफ-सुथरा हाईजीनिक हो गया,
फिर वह सब कुछ कहीं छूट गया,
अब घरों के काँच भी कम टूटते हैं, 
वैसे भी मकान बहुत ऊँचे होने लगे,  
और गलियों में बच्चे भी नहीं दिखते, 
सबको दौड़ में आगे रहना है,
वह छुपके घर आना, फिर जमके पिटाई, 
चुपके से माँ का खिलाना,
तुरंत सब भूल जाना, 
अरे आज़ मार नहीं पडी‌, कुछ गडबड है?
कोई भी घर ऐसा नहीं, 
जहाँ बच्चों के झगडने का शोर न हो, 
हर घर में रौनक बनी रहती,
न जाने क्यों सब समझदार हो गए, 
अब कोई शोर नहीं होता, 
कोई लडता नहीं, कोई बहस नहीं होती,
कोई गलत साबित नहीं होता, तो कोई सही भी नहीं,
वो जिद करने वाले टोकने वाले बच्चे कहाँ है? 
जो हर बात पर लडते,
जिन्हे ठेले वाले देखकर हंस देते, 
चलो अब कुछ बिक जाएगा,
सब कुछ डिसप्लीन में, पढना, हँसना, बोलना,
डिस्प्लीन में......कोई बचपन होता है क्या??
बच्चे जब ज़िद नहीं करते, 
अच्छा नहीं लगता, 
वह लडना जोर-जोर चिल्लाना,
घंटो रोना, रूठ जाना, 
किचन से आवाज़ आयी, 
तुम्हें खाना है कि तुम्हारा भी खा लूँ,
फिर जैसे कुछ हुआ ही न हो, 
और खाने पर टूट पडना,
अब तो कम्प्यूटर, मोबाइल पर, 
घंटो आँखे गडाए रहते हैं,
कहीं किसी से कोई जान पहचान नहीं,
गोलू की जगह, पडोस में मोनू रहने लगा,
पता ही ना चला, 
मोबाइल पर तो सब वैसे ही है,
चलो अच्छा है, 
अब गेंद नही खोती, 
कोई काँच नहीं टूटता,
वह, मोटा चश्मा लगाए, 
टीवी के सामने बैठा है.

Sunday, 10 January 2016

child soldier

लड़ रहा हूँ मै यहाँ न जाने किसके लिए,
किससे बदला लूँ किसका कत्ल करूँ,
मेरे गाँव से शहर तक एक ही मंजर है,
मेरे लिए कोई जगह नहीं है,
वो कहते हैं, तुझे लड़ना होगा,
तूँ हमारा है, तेरे लोग खतरे में हैं,
तूँ हमारा है, हमारे साथ चल, तुझे सब मिलेगा,
बस ए वाला हथियार अपने साथ रख,
मैंने पूँछा मेरा घर कहाँ है?
उसने आँखे लाल की,
एक झंडा‌ दिया, फिर नारा दिया,
क्या ए काफी नहीं है? तेरे लिए,
घर की बात तो कायर करते हैं,
हम तो आग हैं, जलते हैं, जलाते हैं,
तभी मै समझा,
मेरा घर क्यों जला,
वहाँ पहले से ही कोई मौजूद था,
जिसमें यही आग भरी थी,
न जाने कब से जल रहा था,
जिसकी चिंगारी से मेरा घर राख हुआ,
उसकी बात ड़र कर सुनता रहा,
वह खतरों की बात करता रहा,
उसकी शक्ल, उसकी बात,
मुझे डराती रही,
फिर ज़ोर-ज़ोर नारे लगे,
और मै खो गया,
मेरा घर, मेरे लोग, अब न जाने कहाँ हैं,
मै अब खुद से डरता हूँ,
ज़ोर-ज़ोर चिल्लाता हूँ, 
अब रो नहीं सकता,
जो मरती, डाटती, नाराज़ होती,
वह पता नहीं कैसी होगी?
मै नहीं कहूँगा,
माँ तुम्हारी याद आती है,
मै अब भी उतना ही डरता हूँ,
सच में मुझे पता नहीं,
मै किससे क्यों लड़ रहा हूँ?
सामने खून बहता है, धमाके होते हैं,
न कुछ देखता हूँ, न सुनता हूँ,
चीखता हूँ न जाने किस पर?
ढूँ‌ढता हूँ न जाने किसको?
मै कौन हूँ, क्या हूँ, क्या कहूँ?
मै खुद से दूर अज़नबी हो गया हूँ,
किसी गली, किसी सड़क से, 
फर्क नहीं पड़ता,
मुड़ के इन रास्तों को कहाँ देखता हूँ,
मुझे मालूम है, मेरी कोई वापसी नहीं है,
कोई घर नहीं है, जहाँ लौट कर,
जाना हो, अब कोई पता नहीं है,
वह नाम जो घर वालों ने दिया था,
 उसे भूले एक अरसा हो गया,
हाँ मै ड़रता हूँ, जीने की न जाने क्यों?
चाहत अब भी रखता हूँ,
कोई उम्मीद शायद अब भी बची है,
तभी धमाका होता है,
कई दिनों से हम साथ थे,
नाम की जरूरत नहीं पडी,
मै इस बार बच गया,
मै चीखता हुआ आगे बढा‌,
सबने समझा मै बहुत बहदुर हूँ,
जबकि उस धमाके के बाद जो हुआ,
उसे देखने की हिम्मत नहीं थी,
मै बिना आँसू रो रहा था,
मेरे मुँह से नारे निकल रहे थे,
जिसके सिवा बहुत दिनों से,
और कुछ बोला नहीं था,
मै लड़ता रहा न जाने किसके लिए?
हाथ में बंदूक थामे बढ़ रहा हूँ,
छोड़के सबकुछ,
 न जाने कहाँ,चल रहा हूँ,
खून बहता है मेरा, रोज़ मरता हूँ यहाँ,
न जाने किसके लिए?
आज़ रहनुमाओं ने फैसला किया है,
 बागियों की अब उन्हें, जरूरत नहीं है,
नयी फौज़ बनेगी, नए हथियार आएंगे,
अब नारा दूसरा है, यही तो खेल है,
प्यादों को तो मरना है,
यूँ सत्ता, ताकत का व्यापार होगा,
जो सबसे कमज़ोर है,
पहला शिकार वही होगा... 

Saturday, 9 January 2016

समझ

काश मुझमे थोडी समझ होती,
रामयन,कुरान समझ पाता,
तो सोचिए दुनिया कैसी होती।
अफसोस यही है कि सब सही हैं,
सब अपनी पर कब से अडे हैं,
शायद इसी वज़ह से,
अब तक वहीं गडे हैं,
न आगे बढे‌, न कुछ सीखा।
काश पेड़ ही होते, 
तो,वक़्त के साथ बढ जाते,
फल नहीं तो, कम से कम छाया देते,
या फिर सूख जाते, मुर्झा जाते,
लकडी बनते,
किसी चूल्हे  में काम आते।