Thursday, 8 October 2015

पता नहीं

उसका नहीं कोई पता,
कैसा है? कौन है?
क्या कहूँ? ढूँढू कहाँ?
कौन सी उसकी गली?
किस दरवाजे पर दस्तक दूँ?
हर जगह टँगी है,
किसी नाम की तख्ती,
सबके रंग हैं अपने, 
ना जाने दस्तूर हैं कितने,
मै भीतर गया तो देखता हूँ,
सब खोखले, बेज़ान हैं, एक सी हसरते हैं,
खुद के लिए गढ़ रहे, ऊँचे मचान बन रहे,
सत्ता के पैरोकार है, ए भी दुकानदार हैं,
एक से दिखते हैं सभी, न मज़हब है, न ईमान है।
कुछ लोग हैं, जिनके पास कुछ भी नहीं,
इन मकानों का फर्क भी, ठीक से मालूम नहीं,
कहीं से कुछ मिल गया,
जीवन एक और दिन, आगे बढ़ गया,
शायद वह इन्ही के साथ रहता है,
कहीं धूप में बैठा है, सिसकियाँ लेता है,
खाली पेट सोता है,
वहाँ चोट से उसमें जो रिस रहा है,
वह कतरा-कतरा बह रहा है,
उस फूस के घर में जब आग लगी थी,
वह पूरी तरह जल गया था, वहाँ उसे ढूँढते रहे,
अफसोस! कुछ नहीं मिला था,
खाली है जहाँ कुछ भी नहीं,
जैसे बिखर गया हो,
यहीं अभी,
अब जाना कहाँ?
फिर भी लगता है,
वह आस पास कहीं रहता है,
जैसे यहीं-कहीं छुप के बैठा है,
शायद किसी किसी लंगर में वो,
चुपचाप देखता हो मुझे,
दूर से, कभी पास से,
वह बिना आँख के,
यहीं से गुज़रा अभी,
वह फकीर था, या कोई और,
मौन था, कहाँ कुछ सुन सका,
उसकी तलाश है,
या खुद कि,
इसका फर्क कैसे करूँ?
मेरी पहुँच, मेरी समझ,
रुक जाती है,  
कुछ हदों तक ही जा पाती है,

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