Wednesday, 21 October 2015

कुछ नहीं चाहिए

कौन यहाँ कुछ माँगता है,
तुम सब अपना, अपने पास रखो,
बस हमारा जो है, उसे हमारे पास छोड दो,
हमारा दुःख, हमारी गरीबी, हमारे साथ रहने दो,
तुम्हारा नफरत, तुम्हारा तिरस्कार,
मुझे टुकडों में बाँटता है,
तुम्हें पता है?
मै अपने टूटे मकान में,
दुबारा ईंट नहीं लगा पाऊँगा,
मेरे बच्चे अभी तक घर नहीं लौटे,
मै बेचैन होता हूँ, इस देरी से,
मेरा विश्वास? 
न जाने कहाँ ठहर गया,
वह आस-पास नज़र नहीं आता,
         यूँ लगता है तुम्हारे साथ ही रह गया,         
अब तक तो, यह मुहल्ला, मेरा था,
पडो‌स के बच्चों  में,
जात-धर्म के सवाल?
तुमने ही तो उस दिन,
रंग और झंडे‌ की बात की थी,
तभी से कपडो‌ से परहेज़ होने लगा था,
मै अपनों के बीच डरने लगा,
मुझे मत बाँटो, अपनों के साथ रहने दो,
अच्छा होगा तुम कुछ मत करो,
मेरी आँखों में जो बेवजह ही सही,
किसी के लिए यूँ ही आ जाते है,
उन दो बूँदो को बचे रहने दो,
मै नासमझ, बेकार हूँ,
हँसता हूँ, रोता हूँ,
पर अपनों के साथ हूँ,
खुश हूँ कि अब भी जिंदा हूँ,
तुम सब रख लो,
मंदिर, मज़ार, रामायन, कुरान
मुझे कुछ नहीं चाहिए।
बस जब घर लौटूँ, 
दरवाजा घरवाले खोले,
और मै मुस्करा दूँ...

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