Thursday, 22 October 2015

दशहरा

रावण का पुतला हर साल जलाते रहे, 
पिछली बार से और बडा‌ बनाते रहे,
अब तो चारों तरफ उसकी फौज दिखती है, 
उसे ही देखने को भीड़ जुटती है,
उसी की वैल्यू है, वह अनोखा है, 
सोचो किसी और के दस सीस देखा है,
आज़ का सबसे बिकाऊ, कमाऊ, होनहार है, 
वही आदर्श है, उसी का सम्मान है,
न मर्यादा चाहिए, न पुरूषोत्तम, 
यहाँ तो सभी को सोने के लंका की दरकार है,
अब तो वह सदा वन में रहेंगे, 
रावण की जय-जयकार करेंगे,
उसी का क्रोध है, उसी का अहंकार है, 
सब हडप लेने वाला, वही विचार है,
उसकी एक देह मे दस सीस थे, 
अब यहाँ लाखो देह है,
हर देह में न जाने कितने सीस हैं,
उसकी सेना का सेनापति, अब हर घर में रहता है,
अपनेपन वाला वह रिश्ता, न जाने कहाँ रहता है?
लखनजी का तो नाम सुने एक अर्सा हो गया,
क्या वह अब भी साथ में रहते हैं? 
या फिर कहीं और शिफ्ट हो गए,
वैसे भी भाइयों की अब बनती कहाँ है, 
जब से सब आन लाइन हो गया,
रिश्तों की गरमाहट भी,
लाइक,शेयर में पोस्ट हो गया,
घर वालों की अब जरूरत नहीं पड़ती    
सारा काम आउट्सोर्स हो गया।
वैसे तुम यूँ दूर-दूर कब तक रहोगे?
अपनी जिम्मेदारी से कब तक बचोगे,   
चलो बहुत हुई बेरुखी, 
अब आओ अपनी अयोध्या सँभालो,
बस थोडी तकनीक और तरीके बदल चुके हैं,
तुम्हे न देखकर रावण-रावण करने लगे हैं,
तुम्हारी एक दस्तक ही बहुत है, 
तमाम दरवाज़े खोलने को,
तुम साथ हो यह भरोसा, 
आज़ भी चाहिए,
कोई भी लडाई, 
खुद से लडने को। 

Wednesday, 21 October 2015

कुछ नहीं चाहिए

कौन यहाँ कुछ माँगता है,
तुम सब अपना, अपने पास रखो,
बस हमारा जो है, उसे हमारे पास छोड दो,
हमारा दुःख, हमारी गरीबी, हमारे साथ रहने दो,
तुम्हारा नफरत, तुम्हारा तिरस्कार,
मुझे टुकडों में बाँटता है,
तुम्हें पता है?
मै अपने टूटे मकान में,
दुबारा ईंट नहीं लगा पाऊँगा,
मेरे बच्चे अभी तक घर नहीं लौटे,
मै बेचैन होता हूँ, इस देरी से,
मेरा विश्वास? 
न जाने कहाँ ठहर गया,
वह आस-पास नज़र नहीं आता,
         यूँ लगता है तुम्हारे साथ ही रह गया,         
अब तक तो, यह मुहल्ला, मेरा था,
पडो‌स के बच्चों  में,
जात-धर्म के सवाल?
तुमने ही तो उस दिन,
रंग और झंडे‌ की बात की थी,
तभी से कपडो‌ से परहेज़ होने लगा था,
मै अपनों के बीच डरने लगा,
मुझे मत बाँटो, अपनों के साथ रहने दो,
अच्छा होगा तुम कुछ मत करो,
मेरी आँखों में जो बेवजह ही सही,
किसी के लिए यूँ ही आ जाते है,
उन दो बूँदो को बचे रहने दो,
मै नासमझ, बेकार हूँ,
हँसता हूँ, रोता हूँ,
पर अपनों के साथ हूँ,
खुश हूँ कि अब भी जिंदा हूँ,
तुम सब रख लो,
मंदिर, मज़ार, रामायन, कुरान
मुझे कुछ नहीं चाहिए।
बस जब घर लौटूँ, 
दरवाजा घरवाले खोले,
और मै मुस्करा दूँ...

Thursday, 8 October 2015

उम्मीद है

अपनी सियासत थोडी सी बंद कर दो,
हमें संभलना आता है, एक मौका तो दो,
हमारा पडोसी, अब भी हमारे साथ है,
क्या करे वह भी, थोडा डरा, परेशान है,
उसका भी घर है, परिवार है,
जब उसने, पीछे से रुक जाने को कहा,
मुझे लगा हमारे बीच,
अब भी भरोसा बरकरार है

पता नहीं

उसका नहीं कोई पता,
कैसा है? कौन है?
क्या कहूँ? ढूँढू कहाँ?
कौन सी उसकी गली?
किस दरवाजे पर दस्तक दूँ?
हर जगह टँगी है,
किसी नाम की तख्ती,
सबके रंग हैं अपने, 
ना जाने दस्तूर हैं कितने,
मै भीतर गया तो देखता हूँ,
सब खोखले, बेज़ान हैं, एक सी हसरते हैं,
खुद के लिए गढ़ रहे, ऊँचे मचान बन रहे,
सत्ता के पैरोकार है, ए भी दुकानदार हैं,
एक से दिखते हैं सभी, न मज़हब है, न ईमान है।
कुछ लोग हैं, जिनके पास कुछ भी नहीं,
इन मकानों का फर्क भी, ठीक से मालूम नहीं,
कहीं से कुछ मिल गया,
जीवन एक और दिन, आगे बढ़ गया,
शायद वह इन्ही के साथ रहता है,
कहीं धूप में बैठा है, सिसकियाँ लेता है,
खाली पेट सोता है,
वहाँ चोट से उसमें जो रिस रहा है,
वह कतरा-कतरा बह रहा है,
उस फूस के घर में जब आग लगी थी,
वह पूरी तरह जल गया था, वहाँ उसे ढूँढते रहे,
अफसोस! कुछ नहीं मिला था,
खाली है जहाँ कुछ भी नहीं,
जैसे बिखर गया हो,
यहीं अभी,
अब जाना कहाँ?
फिर भी लगता है,
वह आस पास कहीं रहता है,
जैसे यहीं-कहीं छुप के बैठा है,
शायद किसी किसी लंगर में वो,
चुपचाप देखता हो मुझे,
दूर से, कभी पास से,
वह बिना आँख के,
यहीं से गुज़रा अभी,
वह फकीर था, या कोई और,
मौन था, कहाँ कुछ सुन सका,
उसकी तलाश है,
या खुद कि,
इसका फर्क कैसे करूँ?
मेरी पहुँच, मेरी समझ,
रुक जाती है,  
कुछ हदों तक ही जा पाती है,

Thursday, 1 October 2015

अफ़वाह

किसी घर को तूने आज़ बेरंग कर दिया,
मज़हब के नाम पर ए क्या हो गया?
इंसानियत शर्मसार करके,
कौन सा झंडा बुलंद हो गया?
 हाथ में शोले हो तो कब तक बचेगा?
 तूँ भी यतीम होगा, तेरा भी घर जलेगा।
वह घर जो तूँ जलाकर आया है,
उसके शोले अब भी वहाँ कायम है,
वही नफरत, अब वहाँ से उठेगी,
वैसे भी चिंगारियों को, 
शोला बनने के लिए,
एक अफवाह ही काफी है..