Saturday, 26 September 2015

मिट्टी का

(Photo from the wall of Sunil Umarao sir)
 मै खाली हूँ, बेज़ान हूँ
मिट्टी का हूँ तो क्या हुआ,
जिंदगी की धूप सही है,
जिसने रंग बदल दिया,
आग में तप कर पक्का हो गया,
मुझमें कुछ भर सके इसलिए
खुद को सदा खाली रखा,
दुनिया की ठोकरों से,
अब भी चटकता हूँ,
जैसे कभी था ही नहीं,
कुछ इस तरह,
मिट्टी में वापस मिल जाता हूँ,
कुम्हार की चाक पर,
उसकी उंगलियों में नाच जाता हूँ,
मै फिर वही रिक्तता लिए,
नए आकार में ढल जाता हूँ 

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