Wednesday, 30 September 2015

फिर वही हुआ

मै हैरान हूँ, परेशान हूँ, 
उससे ज्यादा शर्मसार हूँ,
क्या अब भी इंसान हूँ?
जब कत्ल होना, करना, काम हो गया,
ऐसे बेअक्ल की, जानवर भी हैरान हो गए,
बिना सबूत, जज और जल्लाद हो गए,
इंसानियत जलाने चल दिए,
मंदिर-मस्जिद की आड़ में,
न जाने कब? खुदा और भगवान हो गए,
कहीं जमीन का धंधा है, कहीं किसी का व्यापार है,
बिका है, झुका है, इमान इस तरह,
गुलाम बन गया है, वज़ूद किस तरह?
किस गंगा में नहाएगा?
बता वज़ू करने कहाँ जाएगा?
जब रिसता हो खून, तेरे ही जिस्म से,
और कितने दिन जिंदा रह पाएगा,
जिनको तूने यतीम किया है,
उनकी बेवा माँ, तुम्हारे ही घर पर मिलेगी,
तुम्हारी माँ, बहन, बीबी की शक्लों में तुम्हारे साथ रहेगी,
तेरे बच्चे तुझे कातिल नहीं तो और क्या कहेंगे?
तुझे गीता-कुरान से क्या मिलेगा?
जब कोई पत्ता उसकी मर्ज़ी के बगैर नहीं हिलता,
फिर तूँ किसके लिए, बेवज़ह लड़ता है?
अपने ही बच्चे के पास कुछ देर बैठ तो सही,
उसकी फटी किताब,
जो किसी मज़हब की दुकान पर नहीं मिलती,
उसके किस्मत कि लकीरें, यहीं से बनती हैं,
ऊपर वाला उसी के साथ, उसी में चुपचाप बैठा है,
चलो अच्छा है,
तेरे मज़हब वालों को यह पता नहीं है,
 और जब तुम कहते हो,
नई किताब, नई जिल्द लाओगे,
उसे उस हसीन कल की उम्मीद वही देता है,
और वह रोज़ तुम पर यकीन कर लेता है
हाँ! तुमसे एक गुज़ारिस है,
जब कभी उसे नई जिल्द लाकर देना,
उसका रंग .. या .. न हो..

Saturday, 26 September 2015

मिट्टी का

(Photo from the wall of Sunil Umarao sir)
 मै खाली हूँ, बेज़ान हूँ
मिट्टी का हूँ तो क्या हुआ,
जिंदगी की धूप सही है,
जिसने रंग बदल दिया,
आग में तप कर पक्का हो गया,
मुझमें कुछ भर सके इसलिए
खुद को सदा खाली रखा,
दुनिया की ठोकरों से,
अब भी चटकता हूँ,
जैसे कभी था ही नहीं,
कुछ इस तरह,
मिट्टी में वापस मिल जाता हूँ,
कुम्हार की चाक पर,
उसकी उंगलियों में नाच जाता हूँ,
मै फिर वही रिक्तता लिए,
नए आकार में ढल जाता हूँ 

Monday, 21 September 2015

हमारे शहर में

पिछले दिनों एक क़त्ल हुआ था 
हाँ ! वह लड़की थी, 
ढेरों सवाल इसलिए भी उठे थे, 
उसके सही गलत होने कि, 
ठंडी जिस्मों ने खूब चर्चा की,
सुनने में आया है, 
पुलिस ने जाँच पूरी कर ली है,
कोई कातिल अब तक सामने नहीं आया,
जिन पर शक था, सब बरी हो गए,
सभी ने एक दूसरे को शुक्रिया कहा। 
लड़की के घर वालो के पास,
कोई जवाब नहीं है,
सिवाय बेबसी के,
अब भी उसका, वैसे ही इंतज़ार,
इतना बज़ गया, 
आने वाली होगी, क्यों नहीं आयी ?
माँ दरवाज़े से लौट आती है,
अपने में ही खोयी सी,
उसकी तलाश में, 
न जाने कहाँ खो जाती है?
अखबारों के लिए, "वह" अब खबर न रही,
कल शाम ही तो नई वारदात हुई है,
इस बार कोई बच्चा था,
पहचानना मुश्किल था ,
शायद ! लड़का है??

Saturday, 19 September 2015

मै चुप हूँ

कोई लडता है,कोई मरता है,
तो मेरा क्या जाता है?
वह सच सिर्फ उसका था,
बेवज़ह था, शोर था,
सारे समझदार चुप थे,
अब भी वही खामोशी कायम है,
चुपचाप हादसों के पास से गुज़रते है,
दूर से ही देखने की आदत,
वैसे भी न कुछ सुनता है,
न देख पाता है,
चलो इस बार भी मै बच गया,
खामोशी ओढ़कर फिर आगे बढ गया,
क्या हुआ? कुछ भी नहीं,
वह सिर्फ हमारे लिए,
लड़ते-लडते मर गया।