Sunday, 21 June 2015

पिता-पुत्र


मुझमें जो गूँजता है,
वह तुम्ही हो,
मै अपना अक्श जब आइने में देखता हूँ,
तुम्हारे जैसा ही नज़र आता है,
जब तुम्हारी उँगली पकड़कर चलता था,
भरोसे की ड़ोर हर तरफ होती थी,
दौड़कर तुम्हारे सीने से लग जाना,
खुद को हिफाज़त की सबसे सुरक्षित जगह पाना,
मेरे लड़खड़ाते कदमों को थाम लेना,
बाँह थामकर आसमान में उठाना,
मेरा सपना है, तूँ इतना ऊपर उठे,
तेरा पिता तुझे सर उठा कर देखे,
हर बार गोद लेकर यही बताना।
कुछ समझदार हुआ,
जब तुम्हारा हाथ थामा, वह खुरदरे, कठोर थे,
मैंने अपने हाथ कि तरफ देखा…..
तुम्हारा देर रात आना,
अच्छा नहीं लगता था,
हमारे पास तो सब कुछ है,
फिर तुम साथ क्यों नहीं होते?
कभी-कभी महीनों बीत जाता है, तुम नहीं मिलते..
अब मै समझ पाता हूँ,
मेरे पास क्यों सबकुछ था,
कैसे स्कूल जा पाता था,
तुम क्यों मुझसे दूर थे,
रात-दिन के परिश्रम से,
ए हाथ पत्थर हो गए थे,
मेरे लिए ही तुम घर नहीं आते थे,
तुम्हारी झुर्रियों, आँखों में खुद को देखता हूँ,
शायद! पिता-पुत्र का रिश्ता समझ पाता हूँ?
तुम्हारे लिए मै अब भी उतना ही छोटा हूँ,
अनजाने में, जब नाराज़ हो जाता हूँ,
तुम्हारे अंदर के पिता को नहीं समझ पाता हूँ,
अपने बच्चे के लिए वही अनजाना डर,
दुनिया से बचाने की कोशिश.
तुम अपने बूढ़े कमज़ोर शरीर को,
अब भी मेरे लिए खफा देना चाहते हो,
यह बात,
मै अपने बड़े होते बच्चों कि नाराज़गी,
देखकर समझ पाता हूँ,
एक पिता कि दुविधा,
दूसरा पिता आसानी से समझ लेता है,
आज़ कि दुपहरी,
उगते और ढ़लते सूरज के बीच खड़े होकर सोचा,
थोड़ा मौन हो लूँ,
बाहें फैलाकर दोनो को खुद में भर लूँ,
मेरे पिता आपकी यात्रा का मै साक्षी हूँ,
जो कभी खत्म नहीं होगी,
मुझमें तुम सदा मौजूद रहोगे,
यह यात्रा आगे यूँ ही करते रहोगे...

Monday, 15 June 2015

अंतराल


   
पूरे बीस साल बीत गए,
कोई खबर नहीं ली,
पता नहीं वो लोग कैसे होंगे?
सब कुछ कैसे चल रहा होगा?
इच्छा तो कई बार हुई, जाऊँ मिल आऊँ,
अपनी जिद थोडा‌ परे रख दूँ,
थोडी‌ देर के लिए मै ही गलत हो जाऊँ,
हर वक़्त सही होने की आदत,
आखिर क्या मिला? एकदम अकेला ही तो हूँ,
कोई आगे-पीछे नहीं, न कोई कहने सुनने वाला,
तभी खाना बनाने वाला, एक कार्ड़ लेकर आता है,
कमरे की खमोशी टूटती है,
वह बताता है- एक महिला अपनी लड़की के साथ आयी है,
बाहर बरांदे मे चुपचाप बैठी है,
वह खमोशी से कार्ड‌ पढ़ता है,
लड़की का पिता... अपना नाम पढ़ता है!
अरे ए तो मीनू है इतनी बडी‌ हो गयी?
जी चाहता था.. खूब रोए, उससे ए क्या हो गया?
पर उसने कुछ नहीं किया,
बाहर आया पत्नी के सफेद बालों की तरफ देखा,
बेटी भी कुछ बोल नहीं रही थी,
सिर्फ आँसू गिरे जा रहे थे,
बाप आँसू के बूंदों में चुभते सवाल.
समझ रहा था,
पापा “हमे क्यों? खुद से दूर रखा”?
हमारी क्या गलती थी?
शायद यह सवाल पूँछना चहती थी,
पर सवाल जवाब के सारे मायने खत्म होते जा रहे थे,
उसने खुद पर थोडा‌‌ काबू पाया,
पूँछा-कुछ खाया कि नहीं, चलो अंदर, बता नहीं सकती थी आ रही हो,
वैसी ही नारज़गी?
लड़का क्या करता है? क्या-क्या रह गया?
पत्नी पहले कि तरह चुप थी,
काश वह उसी दिन लौट आती,
या फिर न जाती घर छोड़कर, लड़ती, थोडा‌ हक़ जताती,
खैर बीस साल बीत गए,
एक छोटी सी दूरी तय करने में,
क्यों और कैसे खत्म होने में,
कभी-कभी जवाब न देना,
जवाब न ढूँढ़ना भी अच्छा होता है...