Saturday, 18 April 2015

उम्मीद

 तुम्हारी ख्वाइश में,
उसी जगह,
न जाने कहाँ-कहाँ, 
घूम के आ जाता है,
उम्मीद है कि तुमने,
अब तक यह रास्ता, 
बदला नहीं होगा,
न जाने कितने लोग, 
इसी राह को तकते है,
कुछ तो देखने मिलने का दावा करते हैं,
बाकियों को तो सुनने पर ही यकीन है,
आज़ ठहर के वो तेरा दिदार कर लेगें,
इसी कोशिश में, खुशी-खुशी,पूरी उम्र,
न जाने कब गुज़र जाती है

Friday, 17 April 2015

जड़े बची है..


अभी-अभी कहीं और से
उखाड़ के रोपा है,पौधा हरा है
जड़े बची है
सुबह देखनामुरझाई पत्तियाँ,
कैसे अँगड़ाई लेती हैं,
ऐसे ही जिन्दगी के
तमाम जख्म भर जाते हैं 
नया सवेरा, नई रोशनी,
नई बात बता जाती है,
कोई कुछ नहीं कहता,
कहानी खुद ही अपनी,
दास्ता कह जाती है,
अगर उसमे कुछ भी बचा होगा,
वह उठेगा नया घरौंदा,बना लेगा,
मिट्टी में जड़ जमा लेगा,
फिर पतझड़ में पत्तियाँ गिरेंगी,
तब तक वह पेड़ बन चुका होगा..

Sunday, 5 April 2015

वह अकेला है

वह अब भी अकेला है,
सदियों से यही होता रहा,
उसने जो भी कहा, 
किसी के समझ नहीं आयी,
भीड़ ने उसकी एक न सुनी,
वह चुप-चाप,
किसी कोने में जाकर खडा‌ हो गया, 
वक़्त का पहिया आगे बढा‌,
उलझने बढ़ने लगी,
तब वह कुछ याद आने लगा,
किसी ने कहा वह कबीर था,
कुछ ने कहा,
नहीं वह फकीर था,
अब उसे ढूंढने लगे,
पर कोई पहचानता नहीं था,
वह अब भी,
पास वाले कोने मे, 
खडा‌ बड़बडा रहा है,
जिसे कोई सुन नहीं रहा...