Friday, 13 February 2015

smart city


वह अब भी उसी सड़क पर पत्थर तोड़ रही है,
उसने शरीर बदल दिया है, पर! जगह वही है,
कुछ नहीं बदला न भूख, न बेबसी,
बस सड़क चौड़ी हो गई, मकान, और ऊँचे हो गए,
हरे पेड़ वाले किनारे छिन गए,
वह जब तक चाहती, उनके छाँवों बैठी रहती,
खाली वक़्त यूँ ही गुज़र जाता, कोई रोक-टोक नहीं थी,
अफसोस! उन छाँवों को शहर कि नज़र लग गई,
खैर? किससे क्या शिकायत करे?
इस शहर में उसका क्य था?
जो अब उसका नहीं रहा?
हद से ऊँची होती इमारतें,
हर तरफ गज़ब की रोशनी, प्रगति का शोर,
हलाँकि हर ईंट को,
उसी ने तराशा, रंग, और आकार दिया है,
उसे मालूम है कि इस वाली इमारत की नींव खोखली है,
मुनाफे का खेल खूब खेला गया था,
वो जो सबसे ऊँची वाली है,
उसमें भरतिया का पूरा परिवार दफन हो गया था,
किसी ने कुछ नहीं दिया था,
चंदा लगाके क्रिया कर्म हुआ था,
सिर्फ एक दिन काम बंद हुआ था,
उस दिन लाल नीली बत्ती वाली गाड़ियाँ आई थी,
हम लोगों से किसी ने कोई बात नहीं की,
अगले दिन अखबार मे भी कुछ नहीं छपा था,
रमइया ने आज़ सबको बताया,
हमारा शहर अब स्मार्ट सिटी बन जाएगा,
और आलीशान, और ऊँचे मकान बनेंगे,
हरिया के गाँव तक शहर हो जएगा,
ज़मीन का अच्छा भाव मिलेग,
सब खेती-बाड़ी छोड़के दूसरा काम करेंगे,
कुछ नही तो चार हज़ार महीने के चौकीदार बन जाएंगे,
फिर एक बात नहीं समझ में आयी,
इतने पैसे वाले बाबू लोग कहाँ से आएंगे,
सब लोग तो कहते हैं कि हमारा देश गरीब है,
वैसे हमारी गैर कनूनी बस्ती उजाड़ने कि नोटिस आयी है,
आठ लेन वाली सड़क यहीं से गुजरनी है,
अब तो हमारे लिए काम ही काम है,
मुन्ने को देखो कितनी बढ़िया हथौड़ी चलाता है,
आज़ भी उसके मास्टर साहेब स्कूल नहीं आए,
मुन्ना बता रहा था, 
आज़ उनका शहर मे गृह प्रवेश है।

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