Tuesday, 27 August 2013

flood


इन्सान अपनी  फितरत दिखाता रहा, 
उसकी राह में पत्थर पर पत्थर लगाता रहा,
खुद के जीतने का भ्रम ऐसे ही बढ़ता रहा, 
वह भी भला कब तक धीरज रखती,
थोड़ी नाराज़ हुई, 
खुद का एहसास किया, 
इंसानी जीत को घास-फूस में बदलने लगी,
अपने पुराने रस्ते पर चल पड़ी,
लोगों ने कहा बौरा गई,
वह चुपचाप आगे बढ़ती रही, 
नदी को पता नहीं था,
 पत्थर से बनी दीवारों को घर कहते हैं,
वह तो अपने रस्ते चलती रही, 
जहाँ ठहरा करती, 
उन्हीं जगहों को ढूंढ रही, 
लोग उसकी राह में आते रहे, 
ईंट-पत्थर का सबकुछ बनाते रहे,
अपनी नासमझी,
नाकामी का दोष, 
         नदी को देते रहे।          

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