Tuesday, 27 August 2013

flood


इन्सान अपनी  फितरत दिखाता रहा, 
उसकी राह में पत्थर पर पत्थर लगाता रहा,
खुद के जीतने का भ्रम ऐसे ही बढ़ता रहा, 
वह भी भला कब तक धीरज रखती,
थोड़ी नाराज़ हुई, 
खुद का एहसास किया, 
इंसानी जीत को घास-फूस में बदलने लगी,
अपने पुराने रस्ते पर चल पड़ी,
लोगों ने कहा बौरा गई,
वह चुपचाप आगे बढ़ती रही, 
नदी को पता नहीं था,
 पत्थर से बनी दीवारों को घर कहते हैं,
वह तो अपने रस्ते चलती रही, 
जहाँ ठहरा करती, 
उन्हीं जगहों को ढूंढ रही, 
लोग उसकी राह में आते रहे, 
ईंट-पत्थर का सबकुछ बनाते रहे,
अपनी नासमझी,
नाकामी का दोष, 
         नदी को देते रहे।          

Monday, 26 August 2013

मेरा ईश्वर?


मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था,
चाक-चौबंद है,
ऐसा लगता है आज, 
देवता के लिए खतरे की घडी है।
मजाक का नया दौर चला है,
कहते हैं हम, ईश्वर के लिए,
लड़ रहें है।
उसके नाम पर, 
पता नहीं क्या-क्या रच लिया है,
उसको बेचने का कारोबार, 
खूब हुआ है।    
 

Monday, 5 August 2013

ख़ामोशी


बिना शब्दों के, 
ढेरों बातें होती रही,  
तुम्हारा एहसास, 
न जाने कहाँ ले  जाता रहा,
तुमने भी कहाँ कुछ कहा? 
थोड़े-थोड़े लम्हों बाद, 
मेरी तरफ देखने की कोशिश,
और न देख पाना, 
फिर, 
उसी ख़ामोशी का लौट आना, 
जो खुद में बिखर गया था,
उसी को चुपचाप, 
समेटते रहना .....   

क्या हाल है?


किसी ने यूँ ही, 
हाल पूँछ लिया, 
क्या जवाब दे ? 
सोचता रह गया,  
न जाने क्या कुछ,  
होता रहा?
एक पल में,  
कितने पन्ने पलट दिए,  
आँख में कुछ गीला सा लगा?
उसने मुड के नहीं देखा, 
ठीक हूँ , 
कहके, 
हँसने लगा।