Friday, 21 September 2012

आज बंद है


सुबह के वक़्त, नुक्कड़ की दुकान पर, 
काफी भीड़ थी, 
कई रंगों के बैनर पोस्टर लिए लोग खड़े थे।
 भरपूर नाश्ता किया, 
दोपहर में कहीं और खाने का प्रबंध था, 
शहर में एक दिन की मजदूरी, 
कम से कम दो सौ रूपए है, 
इससे कम में कोई तैयार न था, 
जैसे तैसे साथ में ,
नाश्ते और खाने से बात बन गई, 
बंद कराने की तयारी पूरी हुई,
नए लाठी डंडे दिए  गए,
कुछ नए नारे तख्तियों पर लिखे, 
नेताजी ने क्रीज़ टाईट की,  
कुछ ने कुरता-पजामा, 
तो कुछ ने चमचमाती,  
सफ़ेद पैंट शर्ट पहनी, 
पैरों में बड़ी कंपनी का स्पोर्ट शू।
मीडिया चौराहे पर तैनात है, 
नेताजी का जलूस चल पड़ा, 
कुछ ठेले, खोमचे वालों को हडकाया,
साईकिल, रिक्शे से हवा निकाली,
 कमज़ोर दुकानदारों की शटर गिराई,
बड़ी दुकाने ज्यादातर इन्हीं की थी, 
पास खड़ी गाड़ियों में, 
इन्हीं का सामान था।
चौराहे पर, 
किसी सरकार का पुतला फूँका गया ? 
वैसे यह पुतला,
 सफ़ेद कुर्ता-पजामा,पहने था, 
शायद नेताजी का ही पुराना कपड़ा था,
उन जैसा ही था।
फोटो खिचाई की रश्म, 
बखूबी निभाई गई, 
सड़क पर लगा जाम बढ़ता रहा,
 कोई  बीमार था, 
किसी की नौकरी का सवाल था,
नेताजी ने कुछ कहा, 
चमचों ने ताली बजाई, 
दोनों को उसका मतलब पता नहीं था,
सड़क पर बढ़ते काफिले के अन्दर, 
गुस्सा उबलता रहा।
वहीं पुलिस का सिपाही बेमन खड़ा था, 
वर्दी में भी आम आदमी ही था,
अपने साहब पर तरस खा रहा था, 
बस एक मौका तलाश रहा था।
कुछ देर में इस पार्टी वाले चले गए, 
दूसरी पार्टी को भी, 
बंद कराने, 
जाम लगाने का मौका देना था।  
नाश्ते  की दुकान वही थी, 
उन्हीं तख्तियों पर, 
दूसरे नारे पोस्टर लगने लगे,
फिर सब कुछ वही था, 
सिर्फ सफ़ेदपोश की शक्ल बदल गयी।
काफिला अब भी वहीँ रुका पड़ा है,
वक़्त के  इंतजार में,
अन्दर ही सुलग  रहा है।।

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