Tuesday, 12 June 2012

लिखावट


एक लिखावट सामने रखी थी, 
बड़े गौर से देखा, 
समझने की सारी कोशिशें नाकाम रही, 
भाषा और लिपि का विशेषज्ञ था, 
कई साल उलझा रहा, 
कहीं कोई संकेत मिल जाता, 
कुछ तो समझ पाता, 
कोशिशें करता रहा, 
बहुत सी लिपयों को समझ चुका था, 
डूबी खोई सभ्यताओं को नए रूप,
 नए आकार देता रहा, 
अतीत को आज के लिए संजोता रहा, 
उम्र तमाम लिखावाटों को,
 पढ़ने में निकल गयी,
मगर! वह छोटा सा टुकड़ा, 
आज तक पहेली बना रहा, 
वह लिखावट उसे बेचैन करती रही,
लगता है- यह नाकामी 
सारी कोशिशों की हद बताती है, 
जो चाहता था न पा सका, 
यह टुकड़ा हर वक़्त याद दिलाता है,
थका, हारा, बेमन, बैठा, 
उस टुकडे से जूझ रहा था, 
सामने एक छोटा सा बच्चा, 
हँसता हुआ,
मिट्टी में बड़ी लगन से,
 कुछ बना रहा था, 
वह भी हँसने लगा, 
कुछ लिखावटें,
 ऐसे ही लिखी जाती हैं,
जो किसी और से,
 कभी नहीं पढ़ी जाती हैं.  

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