Monday, 5 March 2012

आदमी-नया है..

उसकी लाचारी, 
बेबसी पर मत हंसो, 
कुछ वक़्त का तकाजा है, 
हालात का मारा है,
थोडा सा रुआंसा है, 
कुछ बोलने कहने में, 
सकुचाता है, 
शहर में नया-नया है,
हर जगह उम्मीद से तकता है, 
बारीकी से समझता है, 
सादगी, मासूमियत नज़र आती है,
शायद! कुछ कम पढ़ा-लिखा है, 
कैसे भी,
 आराम से ज़मीन पर बैठ जाता है,
कहीं मिटटी का एहसास छुपा है, 
कुछ दिनों गलियों की खाक छानेगा,
चंद लोगों से दोस्ती होगी, 
दो-चार किताबें पढ़ेगा,
दुनिया के स्कूल से, 
अच्छे नंबरों में पास हो जाएगा. 
ऐसे ही एक और आदमी,
हम जैसा हो जाएगा.        
   

इंतजार

खाली नाव किनारे पर, 
बैठी, रूठी,लगती है, 
दूर किनारा उस पार का, 
उदासी से तकता है.
इंतजाम कुछ भी कर लो, 
एक दूर किनारा होता है, 
सुबह-शाम की लम्बी दूरी,
सूरज रोज़ तय करता है, 
तभ भी दोनों मिल न पाते, 
रात वहीं हो जाती है.
सुबह अकेला ही मिलता है, 
लाख जतन करने पर. 
खाली नाव मांझी का, 
इंतजार करती है,
एक किनारे से मिलके, 
दूजे को तकती है. 
इंतजार किसी का, 
कहाँ ख़त्म होता है,
एक तिनका मिलते ही, 
नए ख़ाब बुनता है. 
ऐसे ही हर वक़्त,
इंतजार रहता है.