Wednesday, 14 September 2011

मै कहाँ हूँ?

मै याद कर रहा हूँ, 
पिछली बार,
 कब सूरज की लाली देखी? 
कब चिड़ियों का चहचहाना सुना?
कब घास पर नंगे पाँव चला? 
कब बहता पानी  हाथ से छुआ?
मै उन दरख्तों को भी याद करता हूँ, 
जिनके छांव में दिन गुज़र जाते थे.
मुझे रात का आसमान देखे, 
एक अरसा हो गया.
 एक बेरंग सी छत में,
चाँद सितारे ढूँढता हूँ. 
मै इस शहर में,
 न जाने कब खो गया,
अपनी यादों में, 
खुद को हर पल ढूँढता हूँ .... 

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