Wednesday, 6 April 2011

gandhi-गाँधी

गाँधी एक बार फिर किसी चौक पर दिखे, 
चुप-चाप, अडिग अपनी आत्म शक्ति के साथ, 
मै हारूँगा नहीं, लडूंगा, पीछे नहीं हटूंगा,

मै कभी अकेला नहीं होता, 
हजारों हाथ मेरे हैं, हजारों का बल मुझ में है. 
सारे निर्बल जब एक हो जाते हैं, 
बड़ी ताकत बन जाते हैं.
वह यही कह रह थे, 
खुद पर भरोसा रखो. 
तुम्हारा दुश्मन खुद हार जाएगा, 
उसके सामने सीना तान के खड़े रहो.
कोई हथियार नहीं चाहिए, 
वह तुम्हारे सच होने की ताकत से, 
कुछ देर में टूट जाएगा. 
थोडा परेशान होगा, चीखेगा, चिल्लाएगा,
कुछ देर डराएगा. 
लेकिन तुम्हारी निर्भीकता से लड़ नहीं पाएगा.
गांधी हर चौक, चौराहे पर मौन, 
अपनी सहनशक्ति, निर्भीकता पर अडिग हैं.
हथियारों का मुकाबला, हथियारों से कब तक होगा ? 
रोज़ नए बनाने होंगे, 
अविश्वास, धोका हर वक़्त होगा, 
मरने-मारने से किसी समस्या का अंत नहीं होगा. 
यह नए रूप में आएगी, भयानक परिणाम दिखाएगी.
गाँधी अब भी मौन अपने पथ पर, 
हमारा इंतजार कर रहें हैं, 
आओ मेरे काफिले में शामिल हो जाओ,
निर्बल की ताकत देखो, 
कैसे एक साथ मिलकर, पूरी दुनिया बदल देते हैं.
तुम अपना हाथ बढ़ाकर देखो,
 तुम्हारा एक हाथ, कितने हाथ बन जाता है, 
अब तो शिकवा-शिकायत भी अपनों से है.
किसका? कौन? कितने दिन खून बहाएगा? 
जब हर बार खुद ही मरना है,
तो इस खून खराबे से क्या पाएगा?
आओ मिलके, गाँधी के साथ, 
गाँधी की राह चलते हैं, 
एक छोटी सी शुरुआत ,
खुद से करते हैं.
                                       

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