Friday, 25 February 2011

black hole

चाहता था कहूं रुक जाओ, 
पर कहा नहीं .
छूने को अक्सर सोचता था,
पर छुआ नहीं. 
धरती से आसमान को देखता था ,
वह नीला, काला, खामोश था. 
धरती अपनी जगह थी, आसमान भी ऐसा ही था .
न एक दूसरे को छुआ, न कुछ कहा, 
धरती आसमान की गोद में घूमती रही .
सूरज का चक्कर लगाती रही, 
आसमान यूँ ही देखता रहा .
अनंत काल से, 
धरतियों को सूरज की परिक्रमा करते हुए .
सदियाँ पता नहीं कब बीत जाती हैं, 
देश काल की अनंत यात्रा में .
सब कुछ शून्य ही रह जाता है,
जहाँ से शुरू हुआ था, आज भी सब वहीँ हैं.
आसमान साक्षी है, 
हजारों सितारों का. 
शून्य से उत्पन्न होकर, 
उसी में खो जाने का .
ब्लैक होल में विलीन हो जाना, 
सितारों की यात्रा है .
मनुष्य जैसी रिक्तता, 
आसमान में भी है . 
सब पूरा करने, पाने की कोशिश में, 
हरदम कुछ रह जाता है ,
यही रिक्तता, 
मानव का दुःख, 
आसमान का ब्लैक होल बन जाता है...  

  

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