Tuesday, 30 November 2010

मै ही हूँ

जब कभी,
कहीं तुम अकेले होना,
खुद में मुझे महसूस करना.
रोने का मन करे, 
उदास होना अच्छा लगे, 
अपनी सिसकियों में मुझे ढूँढना, 
जब अँधेरे के सिवा कुछ नहीं होगा, 
एक दीपक तुम्हें मिलेगा.
मेरी लौ होगी उसमे,
मै तुम्हारे लिए जलूँगा .
तुम्हारे हर एहसास कि, 
छोड़ी हुई परछाइयाँ मेरी हैं.
तुम्हारा यह अकेलापन भी, 
मैं ही हूँ, 
तुम कहाँ,तन्हा, कभी रह सके, 
तुम्हारा वजूद, 
मेरे होने कि पहचान है.
तुम्हारी हर बात मेरे साथ है , 
यह सांस मेरी ही सांस है. 
तुम मुझे कैसे ढूंढोगे ?
जब मै तुम्ही में रहता हूँ,
 तुम्हीं में बसता हूँ.
भूलाने परेशान होने कि आदत ! 
पुरानी है,
वैसे हम तुम जुदा ही कब थे ?.... 

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