Sunday, 21 November 2010

माँ पुरानी है


उसने हर किसी से , 
अपने बेटे को पूंछा ,
 कोई तो उसे जानता होगा ,
वह इतना बड़ा आदमी है , 
बड़े मकान में रहता है,
बेटे का रंग-रूप,
घर के पास कि निशानियाँ भी बताई,
जिसमे एक पुराना पेड़, छोटी दुकान थी . 
वह जिन चीज़ों को जानती थी, 
सबका जिक्र किया , कुछ पता नहीं चला ,
क्योंकि ऐसा तो हर शहर में होता है ,
कोई किसी को नहीं जानता है .
वह पढ़ना-लिखना नहीं जानती , 
दुनिया कि चालाकी नहीं समझती .
बेटे के प्यार में शहर आई थी , 
लाडले ने खूब फुसलाया था .
गाँव में जो भी बचा था ,
उसे बेचना था .
जल्द ही बोझ बन गयी , 
बुढ़ापे का भार उठाना मुश्किल हो गया .
बेटे को पढ़ाने लिखाने में क्या-क्या सहा था ,
कितने दिन भूखे रहकर, उसे खिलाया था .
आज मुन्ना बड़ा आदमी बन गया ,
वह सब कुछ देखता है , 
बस माँ नज़र नहीं आती .
शायद कमज़ोर बूढी माँ , अच्छी नहीं लगती, 
ऊंची सोसाइटी के  फैशन में नहीं जँचती.
आखिर उसकी भी तो कोई इज्ज़त है ,
लोग क्या कहेंगे ?
अरे! यही साहब की माँ है ?
बेटे को इज्ज़त प्यारी है ,
उसे माँ की ज़रुरत ही कहाँ है ?
वह तो सबसे बेकार,
पड़े फर्नीचर से भी पुरानी है ,
बेटे ने एक अच्छी तरकीब निकाली ,
माँ को थोडा सा फुसलाया ,
कहीं घूमने के लिए मनाया .
थोड़ी देर में आ रहा हूँ ,
ऐसा कह कर बैठाया ,
लेकिन यह शहर दूसरा था .
वह अब भी बेटे के इंतज़ार में बैठी है , 
थोडा आस पास रोज़ भटक लेती है .
पर दूर नहीं जाती , बेटे को परेशानी न हो ,
यह सोचकर ,वापस वहीँ आ जाती है .
जहाँ बेटे ने बैठाया था वहीँ ,बैठ जाती है .
जिस तरफ गया था , 
अपलक उसी को निहारती है .
उसका बेटा आएगा ,
इसी उम्मीद में बैठी है ..     

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