Saturday, 16 October 2010

स्त्री


मै वसुधा ,मै ही नारी ,
 रचना मै करती हूँ . 
सबको सींचा करती हूँ ,
सृजन मेरी पहचान ,
नवीनता का मै आधार ,
धर्म जाति से हीन . 
परंपरा,धर्म ,मुझ तक ही सीमित ,
कैसे रहना ,कैसे दिखना ही संस्कृति .
हर धर्म ने मुझको मारा है ,
हर जाति ने मुझको तोड़ा है.
कुछ भी नाम दिया हो, कोई भी काल रहा हो . 
तब भी मै ऐसी ही रही , सबसे यूँ ही जुड़ती रही .
ममता लिए खड़ी रही ,
बच्चों के बनाए नियम से बांधती रही .
नारी जागरण का ज़माना आया .
कदम से कदम मिलाकर चलना है ,
ऐसे  नहीं ऐसे रहना है .
आगे बढ़ाना ,आगे रहना ,
यही आज का कदम ताल है .
भला कोई कब तक आगे रह सकता है ,
जब पाने को पूरा आसमान है . 
फिर भी ,नए नियम का बोझ, 
मुझ मुझे ही सहना है .
मैंने भी सोचा ! 
मै भी बदलूंगी ,दुनिया के साथ चलूंगी .
मेरा भी आकाश है ,
मेरे पंख बेक़रार हैं ,धरती मुझे बुला रही .
समुन्दर में बहना है ,
 रेत पर चलना है , मुझे भी उड़ना है .
लोगों ने कहा
 "अभी दुनिया देखी कहाँ ?"
मैंने कहा 
"यह तो बस शुरुआत है " 

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