Saturday, 5 June 2010

जीवन

जीवन की परिभाषा ,
क्या दे सकती है कोई भाषा ।
आशा और निराशा के बीच ,
निरंतर चलते जाना ।
जैसे जीवन जीना ,
जीवन और मृत्यु के बीच ।
कुछ पा लेने की ख्वाइश ,
या फिर छूट जाने का डर ।
निरंतर दुविधा और संशय के साथ ,
अहर्निश चलते जाना,
नए शब्द और भाषा के साथ ।
यह सच है या वह झूठ, 
सब कुछ जान लाने का भ्रम ।
वह जीवन जीता निरंतर ,
सच और झूठ का ना कोई अंतर ।
वह सही है वह जानता है ,
क्या अर्थ है जीवन का ।
गढ़ लेता है नित नए, 
शब्द और भाषा ।
पर कभी पुष्ट नहीं हो पाती, 
उसकी परिभाषा ।
दुःख, प्रेम, ईर्ष्या, 
तक ही सीमित,
हो जाती है उसकी भाषा ।
कौन अपना, कौन पराया,
जीवन भर यही सीख पाया ।
खूब रोया, खूब चिल्लाया,
पर ! जीवन को न समझ पाया ।
क्योंकि वह कभी, 
निःशब्द, 
नहीं हो पाया ,
अर्थात मौन न हो पाया ,
शब्द और भाषा से ही, 
परिभाषा रचता रहा ।
अगर कभी बाहर से,
 मौन हुआ भी तो,
अन्दर सब चलता रहा ।।