Saturday, 8 May 2010

सूरज की थकान

सूरज दिन भर जलता है ,
प्रकाशित सारी दुनिया करता है ।
पर ! एक दम तन्हा दिखता है ,
लगता है घर से दूर काम पर निकला है ।
दिन भर तन्हाइयों में जीता है,

फिर कैसे ?
इतनी ऊर्जा, अपने अन्दर भरता है ।
रोज़ ख़ुशी - ख़ुशी क्यों? 

जलने चल पड़ता है ।
वह भी जिम्मेदार ही लगता है ,
जो परिवार के लिए जीता है ।
इसलिए हर सुबह,

समय से काम में लग जाता है ।
हाँ! जलते-जलते वह भी ,थकता है ।
शाम की गोद में वह भी ढलता है ,
माँ का आँचल वह भी ढूँढता है ।
अपने भाई बहन,

चाँद सितारों संग गुनगुनाता है ,
चांदनी के संग नाचता है ।
उसकी माँ रात, 

पूरे आसमान पर छा जाती है ,
बेटे को प्यार से सुलाती है ।
सूरज के दिन भर की थकान ,
शाम की मुस्कराहट, 

रात की हंसी,
भोर की खिलखिलाहट,
से ही मिट जाती है ।
सूरज नई ऊर्जा, नई आग ले, 

खुद को जलाने, चल पड़ता है ,
हर सुबह, 

सारे जहाँ को रौशन करने ।
सूरज की तरह हमें भी,

नई ऊर्जा नई आग भरनी है ,
चंद राहें ही नहीं,

 हर घर को रौशन करना है ।
खुद को जलाकर कर ही, 

हम सूरज बन पाएंगे।
दुनिया में हम ही नया प्रकाश लाएंगे ।
अपने आकाश में हमें भी, 

सूरज की तरह जलना होगा ,
बिना रुके हर पल चलना होगा ।
सारे जहाँ को रौशन करना है तो ,
हर पल जलना होगा । .....

No comments:

Post a Comment