Friday, 7 May 2010

बचपन


मैंने देखा है मन की आँखों से ,
महसूस किया है हाथों से ।
हर पत्ते में एहसास उसी का ,
 बचपन तो है नाम उसी का ।
निश्छल प्यारा नाम रखूँ ,

 बचपन तुझको क्या कहूं ।
मिट्टी में ढूंढ ली दुनिया, 

मुट्ठी में बांध ली खुशियाँ ।
बस! ऐसे ही मुस्करा देना, 

 बाहें फैला के रोक लेना ।
छोटी सी जिद पे अड़ जाना ,

 एक हंसी में सब पा लेना ।
कुछ आँखे ऐसी होती है ,

जो सोई सी होती हैं ।
दुनिया को एक रंग से भरती है ,
बिना अंतर देखा करती है ।
पंख लग जाते हैं ,

आसमान में उड़ जाते हैं ।
ख़याल उसके जब ,
 नए रंग ले आते हैं ।

एक छोटी सी हंसी , होठों पर,
 अनायास आ जाती है ।
अंधियारी दुनिया भी तब,

 रौशन हो जाती है ।




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