Saturday, 8 May 2010

कलयुग


बड़े झूंठ हैं ,बड़ी बेवफाई है ,दुनिया में ,
कहतें हैं , घोर कलयुग आ गया ,कोई किसी का नहीं ।
सब धोखे बाज दिखते हैं ,हर कोई यही कहता ,
भगवान भरोसे ही आज सब चलता ।
मै कितना अच्छा हूँ ,वह कितना बुरा है ,
मै कितना कुछ जानता हूँ ।
अपने को अध्यात्म और आदर्श का प्रतीक भी मनाता हूँ ,
पर छोटी सी भी पहचान क्यों नहीं बन पाती ।
मै भी दुनिया को औरों की तरह ,देखता और ठगता रहा ,
झूंठी बेबसी दिखाता रहा , दूसरों के गिरने पर हँसता रहा ।
खुद के अच्छा होने का ढोंग करता रहा ,
पर एक बार भी अपने गिरेबान में नहीं देखा । ...

सूरज की थकान

सूरज दिन भर जलता है ,
प्रकाशित सारी दुनिया करता है ।
पर ! एक दम तन्हा दिखता है ,
लगता है घर से दूर काम पर निकला है ।
दिन भर तन्हाइयों में जीता है,

फिर कैसे ?
इतनी ऊर्जा, अपने अन्दर भरता है ।
रोज़ ख़ुशी - ख़ुशी क्यों? 

जलने चल पड़ता है ।
वह भी जिम्मेदार ही लगता है ,
जो परिवार के लिए जीता है ।
इसलिए हर सुबह,

समय से काम में लग जाता है ।
हाँ! जलते-जलते वह भी ,थकता है ।
शाम की गोद में वह भी ढलता है ,
माँ का आँचल वह भी ढूँढता है ।
अपने भाई बहन,

चाँद सितारों संग गुनगुनाता है ,
चांदनी के संग नाचता है ।
उसकी माँ रात, 

पूरे आसमान पर छा जाती है ,
बेटे को प्यार से सुलाती है ।
सूरज के दिन भर की थकान ,
शाम की मुस्कराहट, 

रात की हंसी,
भोर की खिलखिलाहट,
से ही मिट जाती है ।
सूरज नई ऊर्जा, नई आग ले, 

खुद को जलाने, चल पड़ता है ,
हर सुबह, 

सारे जहाँ को रौशन करने ।
सूरज की तरह हमें भी,

नई ऊर्जा नई आग भरनी है ,
चंद राहें ही नहीं,

 हर घर को रौशन करना है ।
खुद को जलाकर कर ही, 

हम सूरज बन पाएंगे।
दुनिया में हम ही नया प्रकाश लाएंगे ।
अपने आकाश में हमें भी, 

सूरज की तरह जलना होगा ,
बिना रुके हर पल चलना होगा ।
सारे जहाँ को रौशन करना है तो ,
हर पल जलना होगा । .....

Friday, 7 May 2010

बचपन


मैंने देखा है मन की आँखों से ,
महसूस किया है हाथों से ।
हर पत्ते में एहसास उसी का ,
 बचपन तो है नाम उसी का ।
निश्छल प्यारा नाम रखूँ ,

 बचपन तुझको क्या कहूं ।
मिट्टी में ढूंढ ली दुनिया, 

मुट्ठी में बांध ली खुशियाँ ।
बस! ऐसे ही मुस्करा देना, 

 बाहें फैला के रोक लेना ।
छोटी सी जिद पे अड़ जाना ,

 एक हंसी में सब पा लेना ।
कुछ आँखे ऐसी होती है ,

जो सोई सी होती हैं ।
दुनिया को एक रंग से भरती है ,
बिना अंतर देखा करती है ।
पंख लग जाते हैं ,

आसमान में उड़ जाते हैं ।
ख़याल उसके जब ,
 नए रंग ले आते हैं ।

एक छोटी सी हंसी , होठों पर,
 अनायास आ जाती है ।
अंधियारी दुनिया भी तब,

 रौशन हो जाती है ।