Thursday, 17 December 2009

सुनामी


पल में ही ख़त्म हो गया सब कुछ ,
चिता जलाने को भी कम पड़ गए लोग ।
दफ़नाने को भी कहीं नहीं कोई ,
सारे पहचान हो गए ख़त्म ।
बस एक ही नाम मृत , लाश बन गए सब लोग ।
जीवन कितना छडिक , हर कोई भाग रहा है ।
कोई जीवन के लिए ,तो कोई म्रत्यु के डर से।
पर !सभी नाकाम ,एक सा ही अंजाम ।
कोई इस पल, तो कोई उस पल ,
इसी मिट्टी में मिल गया ।
बिना किसी नाम, बिना किसी पहचान के ।
कुछ लोगों को, न मिट्टी मिली, न आग ।
वह काम आए परिंदों के ।

नियम


बेगाने बन जायेंगे अपने,
अपनों से मिलाना कम होगा ।
याद तो आएगी अक्सर,
आँखों में आंसू भी आयेंगे ।
पर ! नियम है ऐसा ही,

बच्चे उड़ जाते पंख जमते ही ।
सूनी आँखे रह जाती, 

उसके वापस न आने पर ।
उसकी मंजिल, उसकी राह,

चल दिया छोड़ घर बार ।
बेटी तो चल देती ससुराल, 

बेटा भी कहाँ रहता साथ ।
खाने कमाने के चक्कर में,

वह भी जाता है परदेश ।
माँ रह जाती घर पर तन्हा, 

बेटी - बेटों की यादों में ।
कैसे डाटा था मुन्ने को, 

कैसे प्यार किया था ।
बेगानों के बीच गया वो, 

कैसे लड़ता होगा उनसे ।
जो रोते - रोते आँचल में, 

छुप जाता था मेरे ।
पापा की जब भी पड़ती, 

थोड़ी सी डाट उसे ।
बेटी भी कैसे होगी ससुराल में ,
पापा की बेटू थी जो,
लाडली पोती थी वो ।
भाइयों से दिन रात  लड़ती,

बात-बात पर रोती थी वो ।
कैसे नियम में बांध पाएगी? 

कैसे उठाना है ? कैसे बैठना है ?
धीरे से बात करना है,

अब उसे अच्छी बहू बनाना है ।
इस नियम को बनाया हमने,

इस नियम को माना मैंने ।
बेटी - बेटों ने ही माँ कहा मुझको, 

पूर्ण किया मुझको ।
वह वक्त भी आ गया,

जब बच्चे दूर उड़ने लग गए ।
अब मुझे छोड़ , एक नया घर बनाएँगे ।
मुझसे मिलने कभी -कभी आएँगे ।
तब मैं भी अपना पुराना घर, 
छोड़ चली जाउंगी ।
एक दिन जब,
मेरे बच्चे,
मम्मी-पापा बन जाएँगे,
नई शक्ल लेकर मै,
फिर इस घर में आऊँगी 
 तब अपने मम्मी -पापा  ,
का चस्मा लेकर 

बिस्तर के नीचे छिप जाउंगी ।

युद्ध

वर्षा पानी बिन बादल के, 
सूनी आँखों से,
आह निकली दिल से, 
उसके न आने से ।
राह चल दिया ऐसे, 
बिन पानी नदी जैसे ।
अंगुली पकड़ के चलता था जो, 
बुढ़ापे का सहारा था वो ।
उसकी माँ कैसे सह पाएगी,
अकेले बेटे के जाने का गम ,
मै तो दुःख छिपाऊंगा, 
बेवजह भी मुस्कराऊंगा,
बेटे के शहीद होने का फक्र दिखाऊंगा ।
पर कैसे ? 
गोलियों से छलनी उठा होगा ?
जरूर अपनी माँ को याद किया होगा ।
लहू की हर बूँद तक लड़ा होगा ,
शहीद तो उधर भी होंगे,
बेबस घर ऐसा ही होगा ।
कोई बाप जब वहां भी तनहा होगा ,
अपने बेटे के, 
यही हालत सोचता होगा ।
उसे दफनाया या जलाया होगा ,
नहीं तो चील कौवों ने खाया होगा ।
मेरे बेटे से ही, 
इस लड़ाई का अंत नहीं होगा ,
अभी कितने ही बापों की, 
आँखें सूनी होंगी ।
माओं की कोखें खाली होंगी, 
यही दर्द, यही आह निकलेगी ,
जब भी लड़ाई होगी,
हार माँ बाप की होगी ।
सीमाएं कुछ बदल जाएंगी,
कुछ नए नाम भी पद जाएँगे ।
रोने को दो आँखें दूर,
किसी कोने में होंगी ।
कौन मारा था?
किसने मारा था ?
किसके लिए? 
कौन याद रखेगा ?
कभी-कभी नारे लग जाएँगे,
शोर भी होगा ।
पर ! इन हारी आँखों के सामने, 
कोई नहीं होगा ,
बेटे के कंधे बिना इन,
इन सूखी लकड़ियों का क्या होगा ?
फिर लड़ाई होगी,
फिर खून बहेगा,
मैं ही कन्धा दूंगा ,
मैं फिर हार जाऊंगा, 
अपने बेटे को ।
लड़ाईयां ऐसे ही होती रहेंगी ,
मैं अपने बेटे को, 
ऐसे ही खोता रहूँगा ।
उसकी माँ से छिप कर रोता रहूँगा ,
हर बार मैं ही हारता रहूँगा ।