Saturday, 22 July 2017

तूँ नदी है

बस यही करना है,
जो कुछ?
अच्छा या बुरा हुआ,
उसे भुला कर,
कत्ल न तो करना है,
और न होना है।
फिर जो दरिया है,
वो भला क्या डूबेगा?
कभी कुछ वक्त के लिए,
नदी भी समुन्दर बन जाती है,
तो वह सिर्फ,
पानी की ताकत बताती है,
ऐसे में कुछ नहीं करना है,
बस किनारों को,
थामकर रखना है,
ए दोनों तेरे अपने हैं,
इन्हीं के बीच रहना है,
अभी बरसात का मौसम है,
ए भी गुजर जाएगा,
तूँ फिर वही नदी हो जाएगा,
जो सबकी प्यास बुझाती है।
फिर क्यों इतना परेशान है?
जो अपनी प्यास बुझाने को,
इधर उधर भटकता है,
जबकि तूँ... खुद नदी है,
पानी से बना है
लबालब भरा है।
जिसे दर बदर ढूँढता फिर रहा है,
वो कहीं और नहीं है?
बस थोड़ा चुप बैठ,
गौर से देख,
अब सुन,
जो तुझसे कुछ
कह रहा है।
कमबख्त!
वह कोई और नहीं है,
तेरा ही कुछ है,
जो तुझमें टूट गया है,
अब भी जुड़ना चाहता है,
कब से कह रहा है,
पर! तूँ कहाँ?
सुनना चाहता हैं?
बस चुप रहकर,
उसे महसूस करना है,
तूँ दरिया है,
ए किसी से कहना,
थोड़ी पड़ता है।
rajhansraju

Friday, 21 July 2017

कुछ बात तो है

मै यूँ ही नहीं हूँ,
जो हर बार उठ खड़ा होता हूँ
कुछ बात हममें जरूर है,
जो बढ़के एक दूसरे को थाम लेता हूँ।
जब आग लगती है बस्ती में,
तो मै भी डरता हूँ,
अपनों की फिक्र में,
हर वक्त रहता हूँ,
ऐसे में सिर्फ,
घर की छप्प़र नजर आती है
दूर उठती चिंगारी,
एक दूसरे के भरोसे को
अजमती है,
कभी-कभी य़कीं करने पर
डर भी लगता है,
मगर वह शख्स,
"हूबहू"
मेरे जैसा है।
वैसे हमारे पास वो ताकत नहीं है,
कि हम हवाओं का रुख बदल दें,
और गंगा यहीं से बहने लगे,
बस इतना जानता हूँ,
हार नहीं मानता हूँ,
घास फूस की एक छत फिर ड़ालूँगा,
क्यों कि मेरे जैसों की तादात कम नहीं है,
और चिंगारियों से उनका वास्ता भी नहीं है,
हाँ! ए सच है,
आग से लड़ना हमें नहीं आता,
पर! शायद! 
उन लोगों को पता नहीं है,
हमें बुझाने की तरकीब मालुम है,
बस एक दूसरे के साथ खड़े है,
और छोटे-छोटे बरतनों में
कुछ भर रखा है।
हमारे सभी घर एक जैसे हैं,
और पानी में फर्क नहीं है।
जब सभी घरों से,
ए बूँद-बूँद कर रिसती है,
तब दरिया बनने में, देर कहाँ लगती है,
फिर उठता हूँ, जुड़ जाता हूँ
नए पत्तों के साथ, हरा-भरा हो जाता हूँ,
मै कटता हूँ, मै जलता हूँ
हाँ! ए सच है ??
न जाने कितनी बार मरता हूँ,
पर हर बार ए रिसता पानी,
मुझको मिल जाता है,
जो अमृत बनकर आता है,
उसकी कुछ बूँदो से,
फिर जिंदा हो जाता हूँ।
हर बार ऐसे ही,
"मै"
एक नया पेड़ बन जाता हूँ।
Rajhansraju

Monday, 17 July 2017

काफिर?

अगर वह सिर्फ तेरा है,
तो मुझको ए बता,
मेरा वाला कौन है,
तुम्ही तो कहते हो,
सब उसकी मर्ज़ी है,
फिर मेरा होना,
क्यों खटकता है,
हाँ मै काफिर हूँ,
किसी बुत के आगे,
नहीं झुकता,
पर दोस्त तुम्हें पता है,
मेरी तस्वीर,
बंदूक से नहीं बनती,
उसका रंग लाल नहीं है..
rajhansraju

Saturday, 15 July 2017

तेरा हिस्सा है

बुजुर्ग दोस्तों ने,
आज के हालात पर,
नाखुशी जाहिर की।
ए क्या हो रहा है?
वो कौन है जो हर तरफ,
जहर भर रहा है?
वह तो एक है,
जिसका नाम हमने,
अलग-अलग रखा हैं।
आँख खोलकर देख,
कहाँ कौन रहता है?
पर ए तो समझ ले
देखना कहाँ, क्या है?
बस मौन रहकर,
खुद में झाँकना है।
अब .. जरा गौर से देख,
कहीं से कोई आया नहीं है,
और कोई आएगा भी नहीं,
यही समझना है,
जिस से लड़ रहा है,
कोई और नहीं "तूँ" खुद हैं,
बस यकीन करना है,
जिसे गैर समझकर नफरत करता हैं,
वो तेरे बदन का हिस्सा है,
बस तेरी सियासत कुछ ऐसी है,
जो कुछ और बात कहती है,
काटके फिर बाँट के टुकड़ों में,
सब पर राज करती है,
लोगों को ऐसे ही जाति धरम पर
यकीं हो जाता है,
फिर किसी और की खातिर,
तूँ कभी हिन्दू,
कभी मुसलमान
हो जाता हूँ।
rajhansraju

Friday, 14 July 2017

कहानी है!

वह खास अंदाज से अपनी बात कहता रहा,
धीरे-धीरे उसकी कहानियों पर यकीं होने लगा,
अब उसके अलावा कोई चर्चा नहीं होती,
कहानी वाला सच हर तरफ बिखरा है,
कुछ और जानने की जरूरत नहीं है
क्यों कि जो सच है,
इतना हसीन नहीं है
फिर वो ख़ाब से क्यों जागे?
और किसी के खाब को,
झूँठा कह दे?
चलो कुछ तो है,
जिसके लिए,
उसे नींद आ जाती है,
उन्हीं कहानियों के सपने,
अपने हिसाब से बुन लेता है,
ऐसे ही पूरे दिन की थकान,
बस! एक नींद से
मिटा देता है।
rajhansraju

रहने दो

अब जो लोग बातें कर रहे,
या कुछ और कर रहे हैं,
उनमें ज्यादातर,
अंदर से एकदम खाली हैं।
उनके पास देने के लिए,
कुछ भी नहीं है।
ऐसे में नफरत और गाली,
के जवाब में,
वही वापस लौट आती हैं,
सब गंदा नजर आने लगता है।
चलो कुछ बात करते हैं,
अरे! तुम खाली हो,
ए बताने की जरूरत क्या है?
तुम्हें कुछ ठीक करने की,
जरूरत भी नहीं है।
बस चुप हो जाओ,
ए गंदगी,
अपने आप,
कम हो जाएगी।
rajhansraju

Thursday, 13 July 2017

लेखा-जोखा

लेखा जोखा बड़े गौर से देखा,
नफ़ा नुकसान एक खेल है,
तेरा अच्छा होना,
तेरे लिए ठीक नहीं है।
क्यों कि तेरा कोई मोल नहीं है
तूँ बाजार के लायक नहीं है,
फिर जो बिकता नहीं,
सच में बेकार है।
वैसे खरीदार कौन है,
ए ठीक से पता नहीं है,
सभी एक जैसे,
लम्बी कतार में,
कैसे भी?
कुछ मिल जाएँ,
बिकने को तैयार हैं।
rajhansraju